Monday, June 29, 2015

         मौन में कौन
अपना  मोदी  मौन  खडा  है  लन्दन  वाला  बोल  रहा है
नमो मन्त्र की माला जपकर,नयेनये  चन्दन घोल रहा है
सुषमा  के भी स्वर गायब हैे,अरूण जेतली  गोल हो गये
शब्दो  के  सौदागर  सारे, ललित  कला  के  घोल हो गये

एक  ही  तोता  बचा  हुआ  हेेै,हर चैनल पर  चिल्लाता है
वो  बेचारा   मजबूरी   में,  रटे  शास्त्र  रट   कर  गाता है
हाँप  रहा   है   काँप  रहा  है, वार  सियासी   झेल रहा है
राजनीति  के  कू - कर्मो  से  गिरते - पडते   खेल रहा है

भीष्म पितामह,कृपा,द्रोण भी,अनुभव के सर छोड रहे हैं
चकव्यूह में फंसे,धंसे  सब, प्रारब्ध  शब्द से  तोड रहे हैं
अर्जुन  का  गाण्डीव  शिथिल हेै,शब्द भेद के ही बाणो से
यंहा  युद्व  याेद्वाओं से कम,रण लूले,लंगडे,और काणो से

घर  के  शकुनि  खेल  रहे  हैं  चौपड, सत्ता   के  पाशों से
मिलकर  हल  सब  ढूंढ  रहे  हैं, कांग्रेस  के इतिहासो से
भ्रष्टाचारी  कबर  के   मुर्दे,  ढूंढ - ढूंढ  कर   खोद  रहे  हैं
प्रजातन्त्र  के  खलियानो  में  अपने  ही  हल जोत रहे हैं

सत्यवती, गान्धारी, द्रोपदी, सत्ता का  सुख  भोग रही है
लालायित  सी  मौन  अदाओं  से इच्छा  को रोक रही हेै
भारी  भरकम  काया  लेकर, घटोत्कक्ष  भी  घूम रहा है
राजनीति  के  कूरूक्षेत्र में,हर प्रश्न  यक्ष  सा  झूम रहा हेै

सारी जनता लालायित है पी.एम.स्वर  संगम सुनने को
सच्चायीे के सत्य असत्य के शब्द अभंगम के चुनने को
बाणी-भूषण रण में  कूदो, कुछ  तो   क्रिया   कलाप करो
या  तो  करो  विरोधी   मर्दन,   या   फिर  पश्चाताप करो

चुप रहने से व्यभिचार को मौन  स्वीकृति  मिल जाती है
चाल,चरित्र और चेहरों की बुनियाद स्वंय ही हिल जाती हेै
ये  प्रजातन्त्र  की  सत्ता  तेरे  शब्दो  के  कारण  जिन्दा हेै
मेरे  मत  की  किमत  भी  तो  मौन  खडी है,शर्मिन्दा है

दुर्भाग्य  है,  प्रजातन्त्र   को   एक   भगोडा   काट  रहा हेै
सम्पभुता  की  राजनीति  को  अपने  ढंग  से बाँट रहा हेै
कुछ ना कुछ तो गड बड है जो सत्ता भी  भयभीत खडी है
कवि आग ये  घटना  छोटी  दिखती  है, पर बहुत बडी है।।
            rajendrakikalam.blogspot.com          

No comments:

Post a Comment