सौहार्द
जज्बात में भी खुद फना होता हुआ क्यों दिख रहा है
सम्प्रदायी भाग्य भारत वर्ष का ,क्यों लिख रहा है
हर कौम की भांषा में शमशीरें चमकती देखता हूॅं
ये कारवाँ तो आज भी बाजार में खुद बिक रहा है
छाछ को भी फूॅंक की पीने की आदत हो गयी
आज हिन्दुस्तान में कैसी इबादत हो गयी
बन्दगी में गन्दगी किस कदर फैली यहाॅं
अब तो पूजा और नमाजी भी शहादत हो गयी
मजहबों के ये मदरसे जालिमो के हो गये
हम तो इस फिरका परस्ती , तालिमो के हो गये
पूजा, नमाजी , खाकसारी, बुतपरस्ती, ये बला
इस जंग में भगवान भी मवालियों हो गये
कौम हिन्दुस्तान की दो-गज जमी को लड रही है
देख लो फिरका परस्ती बे- वजह क्यों अड रही है
पागलों की पैरवी ने ये सबक सिखला दिया
पैगंबरों की नश्ल कब्रिस्तान में क्यों सढ रही है
ये सियासी लोग भी केवल बहाना ढूॅंढते हैं
कोहराम की खूनी नदी में, बस नहाना ढूॅंढते हैं
रोंदते हैं किस कदर , इस मजहबी अंदाज से
हर कफन में भी दफन का शामियाना ढूॅंढते हैं
वो कौन है जो फर्क करता है यहाॅं पर कौम का
नुमाइन्दगी का तर्क करता है यहाॅं पर कौम का
बस, जालिमो पर गौर करने की कला को ढूॅंढिये
मिल जायेगा जो नर्क करता है यहाॅं पर कौम का
हर पत्थरों पर है लिखी, फरियाद मेरे देश की
इन पत्थरों पर है टिकी , बुनियाद मेरे देश की
रंजिसों में भी अमन और प्यार की उम्मीद से
बिखरी पडी है हर जगह औलाद मेरे देश की
इतिहास में तो हर दरिन्दों का गवाह मौजूद है
धर्म के इस आसियाने का तवाह मौजूद है
हम तो गुलदस्ता बनाते हैं यहाॅं हर कौम का
सिलसिला हर नश्ल का वो आज भी मौजूद है
मन्दिरों और मस्जिदों को अब ढहाना दो
इस कदर खूनी नदी में अब नहाना छोड दो
बस, परिन्दों से खुले आकाश में उडते रहो
मान लो इस आग की ,बश, ये बहाना छोड दो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
जज्बात में भी खुद फना होता हुआ क्यों दिख रहा है
सम्प्रदायी भाग्य भारत वर्ष का ,क्यों लिख रहा है
हर कौम की भांषा में शमशीरें चमकती देखता हूॅं
ये कारवाँ तो आज भी बाजार में खुद बिक रहा है
छाछ को भी फूॅंक की पीने की आदत हो गयी
आज हिन्दुस्तान में कैसी इबादत हो गयी
बन्दगी में गन्दगी किस कदर फैली यहाॅं
अब तो पूजा और नमाजी भी शहादत हो गयी
मजहबों के ये मदरसे जालिमो के हो गये
हम तो इस फिरका परस्ती , तालिमो के हो गये
पूजा, नमाजी , खाकसारी, बुतपरस्ती, ये बला
इस जंग में भगवान भी मवालियों हो गये
कौम हिन्दुस्तान की दो-गज जमी को लड रही है
देख लो फिरका परस्ती बे- वजह क्यों अड रही है
पागलों की पैरवी ने ये सबक सिखला दिया
पैगंबरों की नश्ल कब्रिस्तान में क्यों सढ रही है
ये सियासी लोग भी केवल बहाना ढूॅंढते हैं
कोहराम की खूनी नदी में, बस नहाना ढूॅंढते हैं
रोंदते हैं किस कदर , इस मजहबी अंदाज से
हर कफन में भी दफन का शामियाना ढूॅंढते हैं
वो कौन है जो फर्क करता है यहाॅं पर कौम का
नुमाइन्दगी का तर्क करता है यहाॅं पर कौम का
बस, जालिमो पर गौर करने की कला को ढूॅंढिये
मिल जायेगा जो नर्क करता है यहाॅं पर कौम का
हर पत्थरों पर है लिखी, फरियाद मेरे देश की
इन पत्थरों पर है टिकी , बुनियाद मेरे देश की
रंजिसों में भी अमन और प्यार की उम्मीद से
बिखरी पडी है हर जगह औलाद मेरे देश की
इतिहास में तो हर दरिन्दों का गवाह मौजूद है
धर्म के इस आसियाने का तवाह मौजूद है
हम तो गुलदस्ता बनाते हैं यहाॅं हर कौम का
सिलसिला हर नश्ल का वो आज भी मौजूद है
मन्दिरों और मस्जिदों को अब ढहाना दो
इस कदर खूनी नदी में अब नहाना छोड दो
बस, परिन्दों से खुले आकाश में उडते रहो
मान लो इस आग की ,बश, ये बहाना छोड दो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
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