दिल में दिल्ली-बिल में बिल्ली
मैं दिल्ली हूँ दुनियाँ भर के चोर, लुटेरे झेल रही हूूूूँ
आजादी से लेकर अब तक, बीहड में ही खेल रही हूँ
इतिहासों के जनवासों में उपहासों को छाँट रही हूँ
राजनीति से लुटि-पिटी हूँ,फिर भी इज्जत बाँट रही हूँ
इस भारत की राजनीति में मुन्ना भाई आम हो गये
प्रजातन्त्र के बोट - बैंक से सारे रावण राम हो गये
बापू तेरी इस खादी में गुनाहगार सब चरित्रवान हैं
इन चोरोंं पर संविधान की धाराएं भी मेहरबान हैं
लाखों पप्पू बोट - बैंक की राजनीति में पास हो गये
सबसे ज्यादा नंग,लंफगे सत्ता दल में खास हो गये
लीचड,कीचड और कमीने ही चुनाव अब लड सकते हैं
डाकू, गुण्डे और मवाली ही गुण्डो से भिड सकते है
सभी दलों में व्यभिचारों के डी.एन.ए. ही फूट रहे हैं
अपनी-अपनी सीमा में सब माल श्वांस से घुंट रहे हैं
सब चोर-चोर को चौबारे में चतुरायी से पकड रहे हैं
अब सत्य,अहिंसा के चोले में सारे डाकू अकड रहे है
चोर - चोर मौसेरे भाई, प्रजातन्त्र की सौगाते हैं
क्या भारत के संविधान से हरिश्चन्द्र चुनकर आते हैं
प्रजातन्त्र की पांञ्चाली को अब रक्षक ही लूट रहे है
गिरधारी के हाथ से पल्लू द्रोपदीयों के छूट रहे है
राजनीति की स्वर्ण - चर्म को सीता माता भाँप रही है
चरित्रवान लक्ष्मण की नजरें देख रही है काँप रही है
नाक, कान कटवा कर सूपर्णखाँये खुल्ली घूम रही है
भारत माँ भी देख-देख कर,मौन खडी है झूम रही है
अब घनानन्द से चन्द्रगुप्त,चाण्क्य सुरक्षा माँग रहे हैं
यवन भेष में सभी सिकन्दर,भारत को शूली टाँग रहे हैं
मुगल और अंग्रेज भी घर में खुल्लमखुल्ला नाच रहे हैं
सभी विदेशी आज हमारी औकातों को बाँच रहे है
सारे नंगे अगल - बगल की सीमाओं में विद्यमान है
हम नंगो के बीच खडे है, नंगो पर ही मेहरबान है
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व की,धरती का अब नास हो गया
कवि आग की रचना में ये व्यभिचारी ही खास हो गया।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
मैं दिल्ली हूँ दुनियाँ भर के चोर, लुटेरे झेल रही हूूूूँ
आजादी से लेकर अब तक, बीहड में ही खेल रही हूँ
इतिहासों के जनवासों में उपहासों को छाँट रही हूँ
राजनीति से लुटि-पिटी हूँ,फिर भी इज्जत बाँट रही हूँ
इस भारत की राजनीति में मुन्ना भाई आम हो गये
प्रजातन्त्र के बोट - बैंक से सारे रावण राम हो गये
बापू तेरी इस खादी में गुनाहगार सब चरित्रवान हैं
इन चोरोंं पर संविधान की धाराएं भी मेहरबान हैं
लाखों पप्पू बोट - बैंक की राजनीति में पास हो गये
सबसे ज्यादा नंग,लंफगे सत्ता दल में खास हो गये
लीचड,कीचड और कमीने ही चुनाव अब लड सकते हैं
डाकू, गुण्डे और मवाली ही गुण्डो से भिड सकते है
सभी दलों में व्यभिचारों के डी.एन.ए. ही फूट रहे हैं
अपनी-अपनी सीमा में सब माल श्वांस से घुंट रहे हैं
सब चोर-चोर को चौबारे में चतुरायी से पकड रहे हैं
अब सत्य,अहिंसा के चोले में सारे डाकू अकड रहे है
चोर - चोर मौसेरे भाई, प्रजातन्त्र की सौगाते हैं
क्या भारत के संविधान से हरिश्चन्द्र चुनकर आते हैं
प्रजातन्त्र की पांञ्चाली को अब रक्षक ही लूट रहे है
गिरधारी के हाथ से पल्लू द्रोपदीयों के छूट रहे है
राजनीति की स्वर्ण - चर्म को सीता माता भाँप रही है
चरित्रवान लक्ष्मण की नजरें देख रही है काँप रही है
नाक, कान कटवा कर सूपर्णखाँये खुल्ली घूम रही है
भारत माँ भी देख-देख कर,मौन खडी है झूम रही है
अब घनानन्द से चन्द्रगुप्त,चाण्क्य सुरक्षा माँग रहे हैं
यवन भेष में सभी सिकन्दर,भारत को शूली टाँग रहे हैं
मुगल और अंग्रेज भी घर में खुल्लमखुल्ला नाच रहे हैं
सभी विदेशी आज हमारी औकातों को बाँच रहे है
सारे नंगे अगल - बगल की सीमाओं में विद्यमान है
हम नंगो के बीच खडे है, नंगो पर ही मेहरबान है
राम,कृष्ण,महावीर,बुद्व की,धरती का अब नास हो गया
कवि आग की रचना में ये व्यभिचारी ही खास हो गया।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
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