कवि जागृति
रोद्र में श्रृंगार की कविता कवि क्यों गा रहा है
बस,आज तो श्रृंगार ब्युटि - पार्लर में जा रहा है
देख लो सेान्दर्य रचना हो रही है दूकान में
अब प्लास्टिक की सर्जरी है श्रृष्टि के सौपान में
श्रृंगार दुनिया में कंहा किस को नजर अब आ रहा है
विभत्स में श्रृंगार की कविता कवि क्यों गा रहा है
वाशना दिल में गरीबी की कवि दिखला रहा है
मन कवि श्रृंगाार के रस पान से बहला रहा है
राष्ट्र हित में लिख सके,अब वो कवि दिखते नही हैं
बिक रहे हैं, भाट, चारण, पर कवि बिकते नही हैं
अब व्यंग के भी रंग कविता में नजर आते नही
राष्ट्र -भक्ति के ,व्यथित कवि भी, भीड को भाते नही
जल गया मेरा वतन श्रृंगार में कवि खो रहा है
तेरी कलम में आग है जाग अब क्यों सो रहा है
साहित्य मुर्दा हो गया तू लाश को क्यों ढो रहा है
निर्भय कलम से मार कर देश में जो हो रहा है
कवि की कलम सम्पन्न है देश के सम्मान में
बेदाग है केवल कवि ही मान में अपमान में
संचार करने की कला है केवल कवि के ज्ञान में
मेरा वतन तो एक है कविता बने जो ध्यान में
अब वक्त की तासीर की कविता कि रचना चाहिये
भेद को जो काट दे, वो शमशीर रचना चाहिये
पाट दे जो हर मजहब को वीर रचना चाहिये
अब श्रृष्टि में साैन्दर्य की तस्वीर रचना चाहिये
कर में कलम कल्लोल कर करतार बनती जायेगी
हर हदों का हाशिया भी पार करती जायेगी
कविता कवि की क्रान्ति में मिशाल बनती जायेगी
सोंन्दर्य श्रृष्टि का सृजन श्रृंगार कविता गायेगी ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
रोद्र में श्रृंगार की कविता कवि क्यों गा रहा है
बस,आज तो श्रृंगार ब्युटि - पार्लर में जा रहा है
देख लो सेान्दर्य रचना हो रही है दूकान में
अब प्लास्टिक की सर्जरी है श्रृष्टि के सौपान में
श्रृंगार दुनिया में कंहा किस को नजर अब आ रहा है
विभत्स में श्रृंगार की कविता कवि क्यों गा रहा है
वाशना दिल में गरीबी की कवि दिखला रहा है
मन कवि श्रृंगाार के रस पान से बहला रहा है
राष्ट्र हित में लिख सके,अब वो कवि दिखते नही हैं
बिक रहे हैं, भाट, चारण, पर कवि बिकते नही हैं
अब व्यंग के भी रंग कविता में नजर आते नही
राष्ट्र -भक्ति के ,व्यथित कवि भी, भीड को भाते नही
जल गया मेरा वतन श्रृंगार में कवि खो रहा है
तेरी कलम में आग है जाग अब क्यों सो रहा है
साहित्य मुर्दा हो गया तू लाश को क्यों ढो रहा है
निर्भय कलम से मार कर देश में जो हो रहा है
कवि की कलम सम्पन्न है देश के सम्मान में
बेदाग है केवल कवि ही मान में अपमान में
संचार करने की कला है केवल कवि के ज्ञान में
मेरा वतन तो एक है कविता बने जो ध्यान में
अब वक्त की तासीर की कविता कि रचना चाहिये
भेद को जो काट दे, वो शमशीर रचना चाहिये
पाट दे जो हर मजहब को वीर रचना चाहिये
अब श्रृष्टि में साैन्दर्य की तस्वीर रचना चाहिये
कर में कलम कल्लोल कर करतार बनती जायेगी
हर हदों का हाशिया भी पार करती जायेगी
कविता कवि की क्रान्ति में मिशाल बनती जायेगी
सोंन्दर्य श्रृष्टि का सृजन श्रृंगार कविता गायेगी ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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