Friday, June 26, 2015

                       तर्क में नर्क
प्रजातन्त्र  में  फुल्लन  देवी लोकसभा  चुनकर आती है
राज्यसभा  को  फिल्मी नथनी ,नाच  नचैया ही भाती हैं
छविराम, मलखान, शेरसिंह, नेता  जी  के सब साथी है
अब लोकतन्त्र  के  हालातो  से  भारत माँ भी शर्माती है

ललित मोदी लन्दन में बैठा,कालिख मूँह में पोत रहा है
मेरे  देश  का  सासन  बंजर  धरती में हल  जोत रहा है
अपने  बीहड   की  रखवाली  में  सब  नेता लगे  हुये हैं
प्रजातन्त्र  जनमत  सोया  है, बस, नेता ही जगे  हुये हैं

चोर - चोर  होता  है भैय्या,कब तक तुम इन्कार करोगे
कोई  ना  काई  पकडेगा  कब  तक  उससे  प्यार करोगे
किसी  के पारिवारिक बन्धन ,कोई मानवता  दिखलाये
संविधान  की  धाराओं  से, ललित मोदी  के  गाने गायें

झूठ बोल कर संविधान की कसमों को  कब तक तोडोगे
सारे धागे  उलझ  रहे  हैं ,सुलझा कर  कब  तक जोडोगे
वाणी-भूषण तर्क विशारद, उछल  उछल कर भोैंक रहे है
नये -नये  निर्णय  से  सारे  बुद्वि - बल्लभ  चौंक  रहे है

बडा  अचम्भा  सिंह  मौन  है  इस  जंगल  के चैबारे में
ललित कला ही पनप रही है राजनीति  के  अंधियारे में
सारे अन्धे, नैनसुखों  की  धूल  आखँ  में  झोंक  रहे हैं
मोदी  भैय्या  लन्दन  बैठे  दाल  सियासी   छोंक रहे हैं

राम,कृष्ण  की  धरती  नेताओं  के  कारण  शर्मिन्दा है
सत्य न्याय का हथियारा,अन्याय अभी  तक जिन्दा है
धर्म  के  ठेकेदार  बने  हैं, सब की  आँखे  फुटी  हुयी हैं
धृष्ठराष्ट्र  की  औलादें  बस  तर्क  शास्त्र  में  जुटी हुयी हैं

राजनीति  का  कोई दल हो छल कपटों से  भरा हुआ है
संविधान जिन्दा  था ,नेताओं  के  कारण   मरा हुआ है
अब तो मैं भी सोच रहा हूं कब तक मैं  लिखता जाउँगा
जब तक दिल में आग लगी है चिन्गारी तो सुलगाउँगा।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                          9897399815
              rajendrakikalam.blogspot.com

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