Monday, June 22, 2015

                प्रजातंत्र का पागल खाना      
हम कवियों की कलमें घिस गयी नेता के गुण गाने में
मेरी  प्रतिभा  फंसी  पढी  है भारत  के पागल खाने में
बडे़-बडे़  पागल  को  जनता  लोकसभा  में डाल रही है
प्रजांतत्र  में  जनता  सदियों से  पागल को पाल रही है

मिली - जुली  नूरानी   कुस्ती  होती  सदन  अखाडे़ में
इनको  तो  टी0  वी0 चैनल  भी  मिल जाते हैं भाडे़ में
कला जंग में  जनता  अपने पागल  सांसद देख रही है
अब  तो  सीधा  प्रसारण  है  दुनिया आॅंखे  सेंक रही है

कुछ बडे़ प्रतिष्ठित पागल  है, उनको ये आभाष नही है
हल्ला-गुल्ला, तोड़-फोड  में  उनकी रूची  खास नही है
ये सभ्य नसल   पागल  भी भीडों से छन कर आते हैं
चिंतन-मंथन  के ये पागल  राज्यसभा  के कहलाते हैं

प्रजातन्त्र का पागल खाना हर पागल को   पाल रहा है
परिपक्वता  का पागल पन पागल  को  संभाल रहा है
र्निजीव जगत के पूरातत्व को पागल सदन दिखाते हैं
फिल्मी  नथनी, नाच ,नचैया  राज्य-सभा  में आते हेैं  

गुण अवगुण आधार बनाकर पागल मंत्री  बन जाता है
धवलवस्त्र खादी में लिपटा ये पागल सब कुछ खाता है
प्रजातन्त्र में लाखो दल है किस्म-किस्म  के पागल के
पंजाब,सिन्ध,गुजरात,मराठा कुछ यू.पी. के भागल के

पागल पन  का  मिर्गी  दौरा कुछ बाबा भी  झेल  रहे हैं
आन बान  सम्मान दाॅंव पर स्वाभिमान से खेल रहे हैं
अलोम,विलोम की कपाल भारती अब संसद मेंआयेगी
नये  ढंग  का  पागल खाना ,  लोकसभा  बन  जायेगी

कुछ  समाज   सेवक  संपादक  जाने  कितनी नस्लें हैं
प्रजातत्र    की  धरती   में  ये  देख  उभरती   फसलें हैं
बिना  खाद-पानी   के  खेतों  में   खुद  ही उग जाती  हैं
पागल पन की  राजनीति  भी   प्रजातन्त्र  से  आती  है

विधानसभा और परिषद मे खुंकार,प्रांत पागल खाने हैं
ये पागल भी  लोक सभा और राज्य सभा के  दीवाने है
परेशान जनता  तो  हर  पागल  को प्रमोशन  दे देती हैे
प्रजातन्त्र  में  पागल   जनता  ही तो नेता की  खेती है

कुछ  पागल  तो लोकपाल से  अपनी अकड़  दिखाते हैं
ये  नये  किस्म  के पागल  है जो  प्रजातत्र  को भाते हैं
पुरातत्व  के  नौकर   शाहो  को बैसाकी  मिल जाती है
बर्षाती मौसम में लारवारिस कलियाॅं  भी खिलजाती हैं

सबसे छोटा नगर  पालिका, पंचायत  का पागल खाना
ये संराय है गली  मुहल्लो  के  पागल का पता ठिकाना
संसद के पागल  खाने  तक  जाने   का  ये पाय दान है
यौवनता  है जोश  भरा है, हरी -भरी   ये  खरी  खान है

व्यभिचार  और चोर,डकैती  प्रशिक्षण  मिल ही जाता है
लोकसभा और विधानसभा का  ये सबसे छोटा भ्राता है
पागल  पन   के   धरने  प्रदर्शन  में  इसका अंह रोल है
बिना ताल के जहाॅ बजालो लोक  तन्त्र  का नया ढोल है

अनपढ़,भोंदू  के चरणो  में भी  ये  पागल  गिर जाता है
सांसद और  विधायक  के  घर ,बे-खोंप  आता  जाता है
पागल जनता  पागल   नेता  प्रजा- तन्त्र  के  पैमाने में
हम पागल  कविता पढते  हैं पागल का दिल बहलाने में

आज   देश   के  सारे   पागलखाने    खाली   पढे़ हुये हेैं
सारे   पागल  राजनीति  में  आने     को  ही  अढे़ हुये हैं
लालकिले में हर  पागल  का  सपना  झण्डा  फहराता है
राजनीति  का सपना कनिमोझी,  कलमाडी बन जाता है

छल, बल ,कपटी, चोर ,चकारी,पागलपन ये के सपने हैं
गौर   करोगे  तो   पाओगे ,  ये   सारे  पागल   अपने हैं
प्रजातन्त्र  के  पाॅच साल में हर कोई पागल बन जाता है
पागल पन के इस  जन-मत से पागल  सत्ता में आता है

राजनीति  के गुण गाने में हम सब पागल  बन  जाते हैं
सत्ता  और  सियासी पागल  हम  सब  की रोटी  खाते हैं
अपने  मत  की  कीमत से ये जनमत  क्यों  घबराया है
ये कवि  ‘आग ’ है  पजातन्त्र  में  आग  लगाने आया है।।
                  राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
                      मो0 9897399815
           rajendrakikalam.blogspot.com



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