Monday, June 8, 2015

                 राम और आम
अब  मण्डियो  में  आम  है  मन्दिरो  में  राम हेै
हिन्दू, मुस्लिम  आढती  के  हाथ  में  ही दाम है
बस  दो  महीना  आम  का, दो  महीना  राम का
गोदाम   हेै  मेरा  वतन  राम का और  आम का

कूरान  मस्जिद  में  पडी, राम  मन्दिर  में  पडा
धर्म  के  व्यापारियों  का   बन गया   कैसा धडा
दोनो  ही  अपने  माल  को उँचा बताते जा रहे है
मजहबी  दल्ले  धर्म  को, नोच कर केे खा रहे है

पेटियों में बन्द  दोनो  किस  तरह  से सढ रहे है
राजनीति में खुदा  और  राम   कैसे   लड  रहे है
बे- वजह ही पागलों  के  पग धरम् में  बढ रहे है
आडम्बरो  की भीड  में अब खुदा  भी  अड रहे हैं

क्रेता  हैं कलमी आम के, नेता है अमली राम के
शक्ल  दोनो  की बताती  ,भाव   क्या  बादाम के
इन पागलो  के द्वन्द  में ये  खेल  हैं  बे - काम के
भक्त  तो  बस  भक्त हैं, क्या  खुदा,  क्या  राम के

अतरंग  में  रस  एक  है ,आम  का क्या राम का
व्यापारियों  में  युद्व  है  अब  देख लो  गोदाम का
बे - खबर हैं रस  से दोना,  द्वन्द  है  बे - काम का
बस, आदमी  ही  मर  रहा  है  युद्व  मे बे-नाम का

आम  हो  या  राम  हो रस तो   परिन्दा जानता है
भेद मन्दिर,मस्जिदो में  वो  कभी नही मानता है
देख  लो   ईमान    कैसे   आदमी   को  खा  रहा है
धर्म की धरती का रस्ता किस दिशा को जा रहा है

अबआम के और राम के कोहराम से मत खेलिये
नई नश्ल  की छाती  में बोझा,मजहबी मत ठेलिये
रसायनो में राम और अल्लाह  को अब ना लाइये
आग  में  जो  गुप्त  है, बस  उस तपिस को गाइये।।
       राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                     मो09897399815
         rajendrakikalam.blogspot.com

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