योग का विनियोग
योग शास्त्र को भारत में मजदूर किसानो ने पाला हेै
भूख से जिसका उदर धँसा है वही योग का रखवाला हेै
मोटे पेटों वाले, मोटी चमडी का यह काम नही है
योगों में भी छल,बल,कपटी पातञ्जलि पैगाम नही है
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह की मुक्ति , योगा की सीढी है
पाँच साल से पन्द्रह साल तक,केवल योगा की पीढी है
पहले तन,मन शुद्व होता है,फिर योग प्रारम्भ कला है
रस, स्पर्स, गन्ध, शब्द, से रूप विकारी सदा पला है
इन सबसे विरक्त हुआ मन योगी की पहली कक्षा है
इस क्रिया की सक्षम गुरू के मिलने से होती रक्षा है
व्यायामों के करने से तो ,व्याधि - मुक्त तन हो जाता है
आनन्द भाव तो पंच विकारो के हटने से ही आता है
पातञ्जलि की इस क्रिया में,पात्र चयन भी एक कला है
कू - पात्र के उपयोगों से, योग - भोग से सदा जला है
शून्य -गमन की योग क्रियाएं इतिहासो में भरी पढी है
खुद को चाहे जैसा करलो, ये योगी की खास कढी हेै
व्यायामो से आगे बढकर, चलते हो तो योग सही है
पातंजलि ने योगशास्त्र में कसरत की कब बात कही है
सात चक्र निर्भेद, भेद कर,ब्रह्म बने बस योग वही है
योगा में भी पंच विकारी आ जाये तो योग नही है
विज्ञापन में योग चलेगा,शास्त्र स्वयं ही मर जायेगा
संस्कारो की बुनियादो में, कूडा करकट भर जायेगा
छोटे - छोटे बच्चो को बस, मर्यादा का पाठ पढाओ
योगा को व्यवसाय बना कर,हाट-बाट में तो ना लाओ
अखण्ड योग की भारत में ,शदियों से बुनियाद पढी है
संस्कारो की गहरायी मेें ब्रह्मचर्य की खाद पढी है
पातञ्जलि की गुप्त धरोहर, विज्ञापन से दूर हटाओ
कवि आग रसपान करो बस, अंगारे ना राख बनाओ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
योग शास्त्र को भारत में मजदूर किसानो ने पाला हेै
भूख से जिसका उदर धँसा है वही योग का रखवाला हेै
मोटे पेटों वाले, मोटी चमडी का यह काम नही है
योगों में भी छल,बल,कपटी पातञ्जलि पैगाम नही है
काम,क्रोध,मद,लोभ,मोह की मुक्ति , योगा की सीढी है
पाँच साल से पन्द्रह साल तक,केवल योगा की पीढी है
पहले तन,मन शुद्व होता है,फिर योग प्रारम्भ कला है
रस, स्पर्स, गन्ध, शब्द, से रूप विकारी सदा पला है
इन सबसे विरक्त हुआ मन योगी की पहली कक्षा है
इस क्रिया की सक्षम गुरू के मिलने से होती रक्षा है
व्यायामों के करने से तो ,व्याधि - मुक्त तन हो जाता है
आनन्द भाव तो पंच विकारो के हटने से ही आता है
पातञ्जलि की इस क्रिया में,पात्र चयन भी एक कला है
कू - पात्र के उपयोगों से, योग - भोग से सदा जला है
शून्य -गमन की योग क्रियाएं इतिहासो में भरी पढी है
खुद को चाहे जैसा करलो, ये योगी की खास कढी हेै
व्यायामो से आगे बढकर, चलते हो तो योग सही है
पातंजलि ने योगशास्त्र में कसरत की कब बात कही है
सात चक्र निर्भेद, भेद कर,ब्रह्म बने बस योग वही है
योगा में भी पंच विकारी आ जाये तो योग नही है
विज्ञापन में योग चलेगा,शास्त्र स्वयं ही मर जायेगा
संस्कारो की बुनियादो में, कूडा करकट भर जायेगा
छोटे - छोटे बच्चो को बस, मर्यादा का पाठ पढाओ
योगा को व्यवसाय बना कर,हाट-बाट में तो ना लाओ
अखण्ड योग की भारत में ,शदियों से बुनियाद पढी है
संस्कारो की गहरायी मेें ब्रह्मचर्य की खाद पढी है
पातञ्जलि की गुप्त धरोहर, विज्ञापन से दूर हटाओ
कवि आग रसपान करो बस, अंगारे ना राख बनाओ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहु गुणा(आग)
मो0 9897399815
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