अभिशाप
राजनीति में चाणक्यों की परिभांषा व्यभिचार हो गयी
भारत में तो भ्रष्टाचारी घनानन्द सरकार हो गयी
बुद्वि- बल्लभ मुद्रा - राक्षस छल , कपटो के साथ खडे है
प्रजातन्त्र में वैमनस्य की राजनीति के लाख धडे है
अगडेपिछडे हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई के जमघट है
लोकतन्त्र की एक नदी में सम्प्रदाय के कितने तट है
राजनीति की नौका पर सब बैतरणी में डोल रहे है
हर मजहब भी अपने-अपने ईश्वर की जय बोल रहे है
इसी देश में अल्लाह ईश्वर, कोर्ट कचहरी भोग रहे हेेै
भारत में तो धर्म हमेशा राजनीति उद्योग रहे है
पातञ्जलि का योग शास्त्र भी राजनीति को झेल रहा है
योगी तोता पञ्चतत्व के पिंजरे में खुश खेल रहा है
अभिराम तो आज भी भारत में जंगल को भोग रहे हैं
कोर्ट- कचहरी कृष्ण की गीता, ये कैसे संयोग रहे है
हर स्टेशन में बजरंगी, भूखे प्यासे डोल रहे है
शिव - सैना के औघड ,सत्ता दल में ही कल्लोल रहे है
महावीर और बुद्व की सैना ,फसल, नश्ल की बढा रही है
बाबा ,माई धर्म की झण्डी,जंहा भी देखो गढा रही है
डेढ अरब की आबादी में गवाल-बाल भरमार मची हेै
प्रजातन्त्र की भीडो ने तो अब तक सब सरकार रची हेै
मंहगायी और भ्रष्टाचारी कौन देश में झोंक रहा है
नेता सब कुछ जान रहा है,चौराहों में भोैंक रहा हेै
ईश्वर ,अल्लाह के सब तोते,व्यभिचार में धंसे पडे हैं
चोर बाजारी राजनीति में, ढूढो तो सब फंसे पडे हैं
आदर्षो के उपहासों में राजनीति फल -फूल रही हेै
अवतारों का पैदा होना क्या भारत में भूल रही है
छल,कपटों से अवतारों के आदर्शों को तो मत जोडो
कवि आग इस धर्मधाम को,राजनीति से भी ना तोडो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
राजनीति में चाणक्यों की परिभांषा व्यभिचार हो गयी
भारत में तो भ्रष्टाचारी घनानन्द सरकार हो गयी
बुद्वि- बल्लभ मुद्रा - राक्षस छल , कपटो के साथ खडे है
प्रजातन्त्र में वैमनस्य की राजनीति के लाख धडे है
अगडेपिछडे हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई के जमघट है
लोकतन्त्र की एक नदी में सम्प्रदाय के कितने तट है
राजनीति की नौका पर सब बैतरणी में डोल रहे है
हर मजहब भी अपने-अपने ईश्वर की जय बोल रहे है
इसी देश में अल्लाह ईश्वर, कोर्ट कचहरी भोग रहे हेेै
भारत में तो धर्म हमेशा राजनीति उद्योग रहे है
पातञ्जलि का योग शास्त्र भी राजनीति को झेल रहा है
योगी तोता पञ्चतत्व के पिंजरे में खुश खेल रहा है
अभिराम तो आज भी भारत में जंगल को भोग रहे हैं
कोर्ट- कचहरी कृष्ण की गीता, ये कैसे संयोग रहे है
हर स्टेशन में बजरंगी, भूखे प्यासे डोल रहे है
शिव - सैना के औघड ,सत्ता दल में ही कल्लोल रहे है
महावीर और बुद्व की सैना ,फसल, नश्ल की बढा रही है
बाबा ,माई धर्म की झण्डी,जंहा भी देखो गढा रही है
डेढ अरब की आबादी में गवाल-बाल भरमार मची हेै
प्रजातन्त्र की भीडो ने तो अब तक सब सरकार रची हेै
मंहगायी और भ्रष्टाचारी कौन देश में झोंक रहा है
नेता सब कुछ जान रहा है,चौराहों में भोैंक रहा हेै
ईश्वर ,अल्लाह के सब तोते,व्यभिचार में धंसे पडे हैं
चोर बाजारी राजनीति में, ढूढो तो सब फंसे पडे हैं
आदर्षो के उपहासों में राजनीति फल -फूल रही हेै
अवतारों का पैदा होना क्या भारत में भूल रही है
छल,कपटों से अवतारों के आदर्शों को तो मत जोडो
कवि आग इस धर्मधाम को,राजनीति से भी ना तोडो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो09897399815
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