Monday, July 25, 2016

पाठकों का रस परिवर्तन कर वर्षात के कहर में प्रकृति की ओर ले जाना चाहता हूँ, एक व्यंग गीत माँ धरती को समर्पित
धरती की वेदना
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी
बहते-बहते बे-जुबां ना जाने क्या-क्या कह गयी
बेजान होकर भी युगों से, इस धरा को जोडती हॅूं
अंकुरों की आश में बीजों को नित में फोड.ती हॅूं
अस्मिता लुटती गयी दुनिया , परायी कह गयी
बर्षात में मेंरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

पालती हूॅं मैं जकड. कर जंगलों को मूल से
हर्ष है संघंर्ष है कंही फूल से कंही शूल से
मैं दरख्तों से दबी हॅूं आबोदाने के लिये
कष्ट में भी मौन हॅूं सम्मान पाने के लिये
साथ मेरा जल, पवन का बह गया, मैं रह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

भेद सरहद का कभी ना आज तक मैंने किया
रोंदने वालों को भी मैंने हमेशा सुख दिया
बेजुबाॅं बेजान बन कर भी जहाॅं को पालती
हर हाल में दुनिया बचे, खुद को रही मैं ढालती
परवरिश करती रही , दुनिया परायी कह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

बनती गयी तरुणा कंही,करुणा कंही,हर हाल में
मुस्कुराती ही रही भूचाल की हर चाल में
मौसमों की मैं नियन्ता श्रृष्टि में बनती रही
हरियालियाॅं हर हाल में,मैं नित नयी जनती रही
सब कुछ लुटा बंजर बनी,बेजान बनकर रह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

बढती रही आबादिंयां, बर्बादियों के नाम से
अब कौन डरता है यंहा पर कुदरती पैगाम से
कट गये मेरे केश तरू थे, मातम मनाने के लिये
मरूद्यान, मरूस्थल बने, विधवा बनाने के लिये
लुटता रहा सौन्दर्य मेरा, घाव केवल गह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

मैं आज भी तैयार हॅूं सर्वस्व खोने के लिये
रब ने बख्शा है हुनर , हंसती हॅॅू रोने के लिये
अपना यंहा कुछ भी नही निर्जीव मिट्टी बोलती है
मौन होकर ये धरा औखात सब की खोलती है
बे जुबाॅं बे जान सी ,बेटी बनी सब सह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी

क्यों सरहदें बनती हैं मेरी छातियों को काटकर
क्यों धर्म,मजहब बन रहे हैं लाश मेरी बांट कर
राष्ट्र के नामाें से अब पहचान मेरी हो रही है
हे विधाता आज तेरी रत्न - गर्भा खो रही है
मैं आग की चिन्गारिंयों में शब्द बनकर रह गयी
बर्षात में मेरे खेत की मिट्टी कटी और बह गयी ।।
    राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग )
मो0 9897399815

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