मोदी जागो
जगा रहा हूँ भारत को अपनी इस कर्कस वाणी से
मैं आस लगाये बैठा हूँ सत्ता के सर्कस प्राणी से
तुम शेर गर्जने वाले थे अब चाबुक से घबराते हो
अगल-बगल के चूहों से क्यो रोज मूँह की खाते हो
तुमको विपक्ष में देखा था,जब मूँह से आग उगलते थे
अब तो लगता है ,थूकों से पकवान पकौडी तलते थे
कंहा गया वो ज्वाला मुख, जो लावा सरस बहाता था
कंहा गया वो सुर - संगम जो भारत माता गाता था
इस छप्पन इञ्च के सीने ने हम में कुछ आशा बांधी थी
ओजस्वी भाषण सुन करके घर-घर मे तेरी आँधी थी
वो सूनामी क्यों शान्त हुयी, शब्दो के जुल्म जखीरों से
कंहा दबी वो आग उठी, जो मिली थी पीर,फकीरों से
दश नर-मुण्ड की बातों को सुषमा संसद में कहती थी
वो शब्द सुरीली कर्कसता ,जनता के दिलों में बहती थी
क्यों शान्त हुयी हेै अग्नि-शिखा,चूहों के शोर शराबों से
अब आग लगी है भारत में ,जागो निन्द्रा के ख्वाबों से
अगल- बगल के चूंहे भी अब खोद रहे बुनियादों को
कुछ तो गुर्राओ मोदी जी, कुछ याद करो उन वादों को
दुनिया भी तेरे साथ खडी अब इन्तजार क्यों करता हेै
इस आतंकवाद को देख जरा,जो घर में रोज पसरता है
बुरहान की मौत के मातम को क्यों पाकिस्तान मनाता हेै
इस जागिर नाईक को देखो ,जो शब्द विषैले गाता हेै
नवाजशरीफ की ओैकातें क्या अब तक समझ नही आयी
जो गले मिला पेशावर में कहता था तुमको भी भाई
सब बन्द करो ये कूटनीति अब फौजों पर एतवार करो
इस गांधीवाद का त्याग करो, सूभाष बनो और वार करो
अब जनता में अकुलाहट है,इस मौन, बधिर की भांषा से
ये कवि आग भी लिखता है हर छन्द युद्व अभिलाषा से।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

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