अब तो चूंहे भी बिलों से बिल-बिलाकर बोलते हैं
मौत के फरमान भी अरमान खुद का खोलते हैं
आवाम भी चाहता है, पाकिस्तान हिन्दुस्तान हो
गीता भरोशा हो हमारा,बस,साथ में कुरूआन हो
नवाज की नमाज
अब नवाज की भी आवाज में खाज दिखायी देती है
पाकिस्तानी लुटि - पिटि वो लाज दिखायी देती है
हृदय परिवर्तन करवा कर मुर्दे का गुर्दा कडक गया
बुझने से पहले दीपक का कपट लपट क्यों भडक गया
अब वजीर भी आतंकी झांसो की भांषा बोल रहा है
दहशत-गर्द दरिन्दो की अभिलाषा को भी खोल रहा है
अपने ही घर के मुर्दो का अभी शोक समागम मिटा नही
ये सहन-शक्ति है भारत की जो मुर्दा अब तक पिटा नही
हमने छाज बोलते देखा था,अब छलनी भी चिल्लाती है
क्यों गुमनाम हवेली भूतों की,औकात स्वयं की गाती है
अब मरे हुये इस जनमत पर क्या काल-चक्र की झांकी है
इस कफन-दफन की धरती में क्या कब्रिस्तान ही बाकी है
जो रोंद रहा है कलियों को गलियों के ठौर - ठिकानो में
अब मौत महातम दिखता है हर पाकिस्तानी गानो में
ये जन्नत है या दो - जख है, विश्लेषण बहुत जरूरी है
क्या मौत निमन्त्रण देती है या सत्ता की मजबूरी है
क्या कुरूआन को पढकर भी इस्लाम समझ में नही आया
क्या ईद मनाने वालों को आवाम समझ में नही आया
दहशत - गर्द दरिन्दो से जो अमन - चैन को चाहते हैं
अब ऐसे दरवेष दरिन्दे ही खुद कब्रिस्तान बनाते हेैं
ये हिन्दुस्तानी भारत है जंहा मजहब - बैर नही होता
ये आर्य - खण्ड है देवों का जो संयम कभी नही खोता
यंहा कौम, कबीले , जाति के सम्बन्ध सरसता बोते हैं
इस कवि आग की भांषा में भारत में मानव होते है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

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