Saturday, July 9, 2016

साथियों इस रचना के साथ एक सुझाव देना चाहता हूं ,सरकार गंगा सफाइ पर करेडों रुपये व्यय कर रही है,इससे पूर्व की सरकारों ने भी करोडों रुपये खर्च किये,परन्तु सफाई के नाम पर परिणाम शून्य रहा,अपितु गंगा और मैली हो गयी। इस पर मेरा सुझाव है किसरकार बोटबैंक के मोह को छोडकर गंगा तट पर बसे कोइ भी गृहस्थी, आश्रमधारी या पर्यटक गंगा में किसी भी तरह की गन्दगी करता है तो उस पर सख्तायी से 500 रूपय से लेकर 5000 रुपये तक का अर्थ दण्ड लगाया जाय, इससे सरकार को राजस्व प्राप्त होने के साथ-साथ गंगा स्वयं स्वच्छ होगी, इस सुझाव को आगे बढाएं
गंगा की वेदना
नित बन रही अट्टालिका गंगा नदी के तीर में
मलमूत्र देखो मिल गया माता के निर्मल नीर में
आश्रमों मठ मन्दिरों से मल छलकता जारहा है
भगवान का ही भेष भागीरथ की गंगा खारहा है

जल में मल की हल चलों से बन गया अमृत जहर
आज तो धर्मात्मा भी कर रहा माॅं पर कहर
सुर सरीता शौच स्थल हर नगर हर गाॅंव में
क्रीडास्थल हो गया व्यवसाय बनकर नाॅंव में

जहान्नवी का नीऱ अब बाजार में भी बिकरहा है
मौन हिन्दुस्तान है स्पष्ट सब को दिख रहा है
मर रही है मछलियाॅं हर घाट पर बे भाव से
क्यों नासूर बनता जारहा है धर्म अपने घाव से
         
युग युगों से फूॅंकते हैं हम शवों को तीर पर
विष की वृष्टि हो रही माता के निर्मल नीर पर
सब आश्रमों की गन्दगी गंगा ही ढोती जा रही है
माॅंता शिशू के कर्म से अस्तित्व खोती जा रही है
                 
गति धार माॅं की रोक कर बस डाम बनते जायेंगें
अधर्म की इस आस्था से हर मजहब मिट जायेंगें
स्नान देवों का यहाॅं होता था निर्मल नीर से
आॅंशू टपकते देखता हूॅं माॅं के हृदय में पीर से
                
गौमुख से गंगा सागरों तक जल से जीवन बाॅंटती
निश्चल धरा की ये धरोहर पाप सबके काटती
धर्म से और कर्म से व्यवसायी रोटी खा रहा है
घाट पर ढोंगी भगत गंगा की गाथा गा रहा है
                  
ये धर्म की अवधारणा अन्तर- मुखी का योग है
आज तो व्यवसाय में गंगा बनी बस भोग है
मन भी निर्मल नीर सा स्वछन्द बहना चाहिये
वात्सल्यता की सुरसरि को निष्कपट मन चाहिये

गंगा सुरक्षा की समीति बन रही है घाट पर
धर्म के व्यवसायी देखो जी रहे हैं ठाट कर
क्यों सनातन सुर सरिता राष्ट्र गंगा हो रही है
बैकुण्ठ की पहचान डबरों में सिमटकर खोरही है
               
छोड दो गंगा को गंगा पर स्वयं बच जायेगी
कौन कहता है कि माॅं अपने शिशू को खायेगी
ये हमारी धारणा माॅं के प्रणय को तोडती है
गंगा सनातन राष्ट्र को वात्सल्यता से जोडती है

मठ ,आश्रमों की गंदगी गंगा में जब तक आयेगी
क्या कलयुगी भागीरथों से आबरू बच पायेगी
तीर्थ तट जहान्नवी से मन विरक्तों मोड दो
माॅं की त्वरा और धार को माॅं के हवाले छोड दो!!
   राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com        

No comments:

Post a Comment