भिन्नता से खिन्नता
सरकारी स्कूल की शिक्षा, बच्चे खींच रहे है रिक्शा
टाट में बैठो,खाओ भिक्षा,प्रजातन्त्र की यही है इच्छा
क्या केवल गुरूजी के बच्चे ही अंग्रेजी शिक्षा पायेंगे
नेता,व्यापारी के बच्चे, सब कान्वेन्ट पढने जायेंगे
बडे - बडे नौकर - शाही के बच्चे होंगे शूट -बूट में
बडे पदों का लाभ मिलेगा,फ्री में शिक्षा खुली छूट में
मध्य - वर्ग भी मरते - मरते अंग्रेजी ही पढवायेगा
मोटी - मोटी फीस भरेगा एक वक्त रोटी खायेगा
छोटे मोटे मजदूरों का शिक्षा भी अब ख्वाब नही है
बच्चे पैदा करने का भी अब भारत में लाभ नही हेै
भीड बढाने से अच्छा है बह्मचर्य अपनाओ भाई
धनवानो का प्रजातन्त्र हेै, मजा ले रहे बाबा,माई
मजदूरों को पैदा करने वाले भारत में जिन्दा हैं
अभिशापों के कारण, नंगे-भूखो की घर-घर निन्दा है
गली-गली स्कूल मदरसे, ही यतीम को पाल रहे हैं
समप्रभुत्व समपन्न देश है हम गरीब को टाल रहे हैं
जगह-जगह स्कूल खुले हेेैं,ज्ञान-ध्यान का पता नही है
शहर गांव में कारा - गृह हेेैं, गुण्डागर्दी,खता नही है
मन्दिर, मस्जिद, गुरूद्वारे हेैं, धर्मो के झगडे जारी हैं
प्रजातन्त्र में बाबा, पण्डित ओैर मौलवी ही भारी हेैं
इन सबकी बुनियाद में केवल ,शिक्षा का ही भिन्न रूप हेेै
इसिलिये तो डेढ अरब की भीडों में हम सब कू-रूप है
क्या एक ही शिक्षा,एक समीक्षा,एक तितिक्षा आ पायेगी
राजनीति क्या समतुल्यता की मानवता पनपायेगी
सरकारी गुरूओं को पहले राष्ट्र -भक्ति अपनानी होगी
सब बच्चों में अपने बच्चों जैसी रीत चलानी होगी
जो कुछ भी वेतन मिलता है उसका कुछ सत्कार करो
सरकारी स्कूल को अपना राष्ट्र समझ कर प्यार करो
फिर से भारत में सरकारी शिशू - निकेतन लहरायेंगे
सरकारी गुरूकुल में बच्चे, फिर से पढने सब आयेंगे
सकल्पशक्ति हो गुरूओं मे, व्यवसायी शिक्षा हट जायेगी
हर गरीब की पीढी शिक्षा, कवि आग फिर से पायेगेी।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)

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