Monday, July 4, 2016

क्या इस रचना को कोइ पढेेगा या समझेगा

नदिया एक घाट बहुतेरे
कह कबीर ये जन्म के फेरे।।
सन्त-पन्थ
धर्म मजहब से उपर उठकर या थोडा सा नीचे गिरकर
समरसता के पटल में बैठे,अगल-बगल में देखो फिरकर
एक कहानी मानवता की ,हर मानव इन्शान दिखेगा
इतिहासों के हर पन्ने पर, लेखक हिन्दुस्तान लिखेगा

धर्मों के उस सार को पकडो,अन्दर है जो तार को पकडो
सरिताओं की धार को पकडो,लहरों के उद्गार को पकडो
लय,सुर सबके एक मिलेंगे, बस केवल झंकार दिखेगी
कविताओं के छन्द जुडेंगे, कविता केवल प्यार लिखेगी

तन,मन,धनअवलम्बन छोडो,जनमत से जनजन जोडो
भेद - भाव की सीमा तोडो, दृष्टि थोडा अन्दर मोडो
एक बीथीका सत के पथ की,भवसागर में नजर आयेगी
आत्मसात लहरों को करलो, सरिता मानव बन जायेगी

मरना,जीना,सुख,दुख सबके जीवन की समरस घटना हेै
धरती में ही जन्म लिया है ,धरती में सबको पटना है
समय-चक्र की इस परिधी में काल-चक्र ही घूम रहा है
हर मजहब में धर्म - ग्रन्थ हेै,मानव पागल झूम रहा है

इतिहासों में मेरा भारत स्वर्ग, मोक्ष का धाम रहा है
मथुरा में था कृष्ण कनैह्या,अवधेशअवध अभिराम रहा है
तुलसी, मीरा,सूर , कबीरा हर पद में समझाते आये
रसखान ने गोकुल, मथुरा, प्रेम-पन्थ के भजन सुनाए

क्या कूरान,हो गीता,बाइबिल,गुरू ग्रन्थ सब शब्द एक है
मानवता में भिन्न मति हों, पर कुदरत, प्रारब्ध एक है
ना समझी के बैर मजहब के कटुताओं के पागल पन हैं
एक मांस,मज्जा के तन में,एक हृदय की लय धडकन है

धरा वही है, त्वरा वही है, बस मानवता भटक गयी है
मरे साँप सी राजनीति क्यों,धर्म-कण्ठ पर लटक गयी है
आर्यखण्ड के मेरू-दण्ड पर अब तो घात लगाना छोडो
कवि आग कहता है ,फिर से भारत को भारत में माडो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment