पर्वत की पीडा
आज हिमालय वर्षा से क्यों अंगारे बर्षाता है
प्रदूषण षिखरों पर देखो अपना तीर्थ बताता है
देवदार और चीडों में लावा की लपट करालें हैं
भागीरथ गंगा की लौ से आग लगाने वाले हैं
सुमन, वृक्ष की शाखाओं पर चिन्गारी लहराती है
सोन्दर्य,शिखर,के गीत सदा से कविताऐं क्यों गाती हैं
भूकंप भयंकर भोगा है,अब ज्वालामुखी ही बाकी है
शदियों से ये देव -भूमि प्रलय-प्रलाप की झाॅंकी है
ये गंजा शिखर महातम का आभाष कराने वाला है
पर्यावरण ,वरण कर हमने महाकाल को पाला है
अब सुरंग विस्फोटों से ये शिखर दहलता जायेगा
इस देव-भूमि को उत्तरा खण्ड का दावानल ही खायेगा
संभ्रान्त निकम्मे धृतराष्ट्र,सम्मान शिखर का खोते हैं
पाखण्डी पर्वत की पीडा ,क्यों दुनिया भर में ढोते हैं
हे पर्वत के परंहंस , क्यों बिकती है ये वशुन्धरा
पानी, औेर जवानी को भी आॅंख खोल कर देख जरा
नाली मुटठी क्यों बिकती है सीढी नुमा पहाडों में
लुट जाती है अव्वल दोयम पंचायत की आडों में
भू - माफिया भूमि-धर को ढूॅंढ रहे हैं परदेशों में
अय्यासी का होटल देखो टिहरी राज नरेशों में
स्वयं हाथ से जंगल को जंगल वाले ही काट रहे हैं
सत्ता और सियासी देखो ,मिलकर बन्दर बाॅंट रहे हैं
असमंजस होता है मुझको देव भूमि के भाॅंडों से
उत्तराखण्ड बदनाम हुआ है ,इन आवारा साॅंडों से
जल श्रोंतों पर जनता ,प्यासी ,कौन समझने वाला है
आज यहाॅं पर चिपको कहने वाला ही मतवाला है
पर्यावरण भ्रमण से तो अब ,परदेशों में ख्याती हैं
स्वर्गारोहण ,नरक द्वार की सीढी क्यों बन जाती है
हिममण्डित शिखर के श्रोंतो सेअब दावानल ही बहती है
शिखरों पर प्यासी जनता है,ये स्वयं सियासत कहती है
ये प्रलय प्रकोप पलायन का हम देख रहे हैं शदियों से
कवि आग कहता है पूछो गाँव,गदरों,नदियों से
आध्यात्म मोक्ष की वसुन्धरा की त्वरा पुनःपरलक्षित हो
चिन्तन,मन्थन ऐसा हो ,हिममण्डित शिखर सुरक्षित हो
नाग,यक्ष,किन्नर,परियों का पर्वत शिखर शिवालय हो
आर्यखण्ड का मुकुट सुशोभित मस्तक पुनः हिमालय हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
आज हिमालय वर्षा से क्यों अंगारे बर्षाता है
प्रदूषण षिखरों पर देखो अपना तीर्थ बताता है
देवदार और चीडों में लावा की लपट करालें हैं
भागीरथ गंगा की लौ से आग लगाने वाले हैं
सुमन, वृक्ष की शाखाओं पर चिन्गारी लहराती है
सोन्दर्य,शिखर,के गीत सदा से कविताऐं क्यों गाती हैं
भूकंप भयंकर भोगा है,अब ज्वालामुखी ही बाकी है
शदियों से ये देव -भूमि प्रलय-प्रलाप की झाॅंकी है
ये गंजा शिखर महातम का आभाष कराने वाला है
पर्यावरण ,वरण कर हमने महाकाल को पाला है
अब सुरंग विस्फोटों से ये शिखर दहलता जायेगा
इस देव-भूमि को उत्तरा खण्ड का दावानल ही खायेगा
संभ्रान्त निकम्मे धृतराष्ट्र,सम्मान शिखर का खोते हैं
पाखण्डी पर्वत की पीडा ,क्यों दुनिया भर में ढोते हैं
हे पर्वत के परंहंस , क्यों बिकती है ये वशुन्धरा
पानी, औेर जवानी को भी आॅंख खोल कर देख जरा
नाली मुटठी क्यों बिकती है सीढी नुमा पहाडों में
लुट जाती है अव्वल दोयम पंचायत की आडों में
भू - माफिया भूमि-धर को ढूॅंढ रहे हैं परदेशों में
अय्यासी का होटल देखो टिहरी राज नरेशों में
स्वयं हाथ से जंगल को जंगल वाले ही काट रहे हैं
सत्ता और सियासी देखो ,मिलकर बन्दर बाॅंट रहे हैं
असमंजस होता है मुझको देव भूमि के भाॅंडों से
उत्तराखण्ड बदनाम हुआ है ,इन आवारा साॅंडों से
जल श्रोंतों पर जनता ,प्यासी ,कौन समझने वाला है
आज यहाॅं पर चिपको कहने वाला ही मतवाला है
पर्यावरण भ्रमण से तो अब ,परदेशों में ख्याती हैं
स्वर्गारोहण ,नरक द्वार की सीढी क्यों बन जाती है
हिममण्डित शिखर के श्रोंतो सेअब दावानल ही बहती है
शिखरों पर प्यासी जनता है,ये स्वयं सियासत कहती है
ये प्रलय प्रकोप पलायन का हम देख रहे हैं शदियों से
कवि आग कहता है पूछो गाँव,गदरों,नदियों से
आध्यात्म मोक्ष की वसुन्धरा की त्वरा पुनःपरलक्षित हो
चिन्तन,मन्थन ऐसा हो ,हिममण्डित शिखर सुरक्षित हो
नाग,यक्ष,किन्नर,परियों का पर्वत शिखर शिवालय हो
आर्यखण्ड का मुकुट सुशोभित मस्तक पुनः हिमालय हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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