जन सेवक की हैशियत्
हे शंसद के संसय नायक, मुझे बतादो क्या चाहते हो
व्यभिचार के नटखट नायक , कैसे लोक सभा आते हो
छल,बल,कपटी,बाणीभूषण को जनता क्यों मान रही है
शकुनि की ये, नशल देश में कैसे सीना तान रही है
चौराहे में भारत माता की इज्जत क्यों लुटवाते हो
हे शंशद के संसय नायक ,मुझे बतादो क्या चाहते हो
हिन्दू,मुश्लिम,सिक्ख,ईसाई के तुम ही तो परिणेता हो
प्रजातंंत्र के इस नाटक के कुशल क्षेम के अभिनेता हो
बस्ती - बस्ती, गाॅंव - गाॅंव, नगर- डगर तुमने बाॅंटा है
देश में तेरे साडू भाई , अंबानी, बिडला, टाटा हैं
जनता की तुम गाली खाकर भी बे-शर्म बने जाते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
जांतपांत में कमल,हाथ में रिक्सा,साइकिल और हाथी है
डबरों की ये राजनीति भी, मूरख मजहब को भाती है
धन - दौलत, दारू , अय्यासी, तेरी सीढी बन जाती है
पाॅंच साल की राजनीति में पीढी दर पीढी खाती है
मेकप करके पुरा - तत्व की कथा मॅंच पर दोहराते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
विश्व-बेंक का सारा कर्जा तुम सब मिलकर चाट रहे हो
राजनीति मतभेद भुला कर ,माया बन्दर बाॅंट रहे हो
ऋण सारा तुम ही खाते हो ,ब्याज हमी पर पेल रहे हो
हम ही खेल के र्निणायक हैं, खेल हमी से खेल रहे हो
गली,मुहल्ले के खलनायक ,आज देश के सहजादे हो
हे शंशद के ससय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
वेतन ,भत्ता पाने को तो ,सभी विरोधी एक साथ हैं
ये खादी का धोती, कुर्ता पायजामा सब एक जात है
संस्कारों को भोग- विलाशों से मिलकर कितना तोडोगे
हे भारत के भले भिखारी, भीख माॅंगना कब छोडोगे
खादी में भी छिपी व्याधियों को जनता में फैलाते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
कंही फर्जी डीग्री घोटाले ,कंही काले -धन के रखवाले
कंही मन मर्जी के मतवाले,सतरंज सियासी हर चालें
शब्दों के बाजीगर , सर्कस लोकसभा में खेल रहे है
अच्छे दिन के जुमलों को हम कर्कस मुर्दे झेल रहे है
शल्य चिकित्सा के माहिर,तुम उपचारों में लगजाते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
सत्ता का विस्तार किया है, सबका बेडा पार किया है
कुछ पर पूरे मेहरबान हो,कुछ पर अत्याचार किया है
अब मंत्री - मण्डल के बढने से वेतन, भत्ता ये चाटेंगें
पहले बांसठ बांट रहे थे, अब अस्सी मिलकर बांटेंगे
राष्ट्र-भक्ति के गीत सियासी हर चैनल पर क्यों गाते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो
जग में था सम्मान हमारा जो अब तुम से अपमानित है
जयचन्दों की राजनीति ही आज राष्ट्र में सम्मानित है
हम भी तो मुर्दें हैं भारत में मुर्दाें को पाल रहे हैं
दुर्भाग्य हम कवियों का है ,हमको ये संभाल रहे है
कवि आग कीे कविता सुनकर झूठ मूठ तुम हॅंस जाते हो
हे शंशद के संसय नायक मुझे बतादो क्या चाहते हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815

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