शब्द की बाजीगरी का खेल आना चाहिये
जिन्दगी के हर सफर में फेल आना चाहिये
हर सियासी को उमर में जेल जाना चाहिये
छल,कपट, व्यभिचार का भी मेल आना चाहिये
पतन का जतन
अब राजनीति में राहुल भैय्या ट्यूशन पढलो
आर.एस.एस. का मिल जाये तो उसे पकडलो
कांग्रेस मे शब्द बहुत हैं पर धार नही है
जंग लगे हथियारों में अब मार नही है
नाम के आगे गांधी है सब मान रहे हैं
धन, बल, और प्रतिष्ठा भी पहचान रहे हैं
इस प्रजातन्त्र में शब्द कोष भी बहुत जरूरी
तभी तो होती है जनता की इच्छा पूरी
अब अपना मोदी शब्दों से ही पाल रहा है
डेढ अरब को जुमलों से खंगाल रहा है
सत्ता शब्दो के जादूगर से ही आती है
पांच साल तक जनता शब्दों को खाती है
फिर उससे बडा लफंगा आगे आ जाता है
वो भी अपना राष्ट्र - गीत खुलकर गाता है
नये - नये जुमलों में जनता फंस जाती है
प्रजातन्त्र मे बस, शब्दों की ही ख्याति है
राहुल भैय़्या अभी समय है ज्ञान बढाओ
चाणक्यो को ढूंढो 10 जनपथ में लाओ
वेद,शास्त्र, गीता रामायण सब शब्द खेल है
राजनीति का शास्त्र शब्द के बिना फेल है
भरी जवानी लोकसभा में क्यों सोते हो
इस तन का उपयोग करो अब क्यों ढोते हो
विवाह-सूत्र में बंध जाओ सब समझ जाओगे
फिर कालीदास का मेघदूत ढंग से गाओगे
इस राजनीति में ब्रह्मचर्य किसका होता है
क्या बिना लालसा के नेता इतना रोता है
सबके अपने - आने आशन, गुप्त भेद हैं
पर राहुल भैय्या तुम्हें देख कर हमें खेद है
गांधीवाद को अब क्या लावारिस छोडोगे
क्या नेहरू परम्परा का सपना तुम तोडोगे
अब अनाथ बनी,क्या कांग्रेस दुर्दिन देखेगी
क्या गांधी की पीढी अब धूँआ फैंकेगी
मैं कवि आग हूँ, आग देखकर बोल रहा हूँ
जो दबी हुयी है आग तुम्हारी खोल रहा हूँ
बहती सरिता का जल हरदम निर्मल होता है
अब कवि आग प्रारब्ध देख कर ही रोता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग

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