Sunday, July 3, 2016

इस रचना को गम्भीरता से पढें
मौन आभाश
कौन निमन्त्रण देता हैे सरिता के तट पर बसने का
कौन निमन्त्रण देता है हर साल शिखर को धंसने का
कौन नियन्त्रण खोता है बाढों के भॅंवर बहावों का
ये भी एक तरीका है इस मौन धरा की आहों का

ना समझ विवेकी मानवता फिर भी पर्वत को घेर रही
दाखिल है आज सियासत में नाली, मुट्ठी की जोत बही
कब्जे में देवों की धरती क्यों राजनीति नर - मुण्डों से
उत्तराखण्ड क्यों पटा पडा है आज सियासी गुण्डों से

प्रकट प्रकोप प्रकृति का अपना अस्तित्व बचाने को
विध्वंश सदा से होता है नव - निर्मित सृष्टि रचाने को
समतुल्य सरस मानवता को प्रलय भी अंक लगाती है
व्यभिचार धरा में होता है विध्वंश स्वयं बन जाती है

इतिहास उठाओ पर्वत का ,बसता था कौन पहाडों में
सरिता ने किसे बहाया है उफान वेग की बाडों में
पाषाण चूर कर मिट्टी से मैदान बनाती आयी है
मानव के खातिर पर्वत ने ये समतल धरा बनायी है

ये देव धरा क्यों बिकती हेै अय्यास, वास के भावों से
आध्यात्म जगत की कुण्ठा है, नासूर स्वयं के घावों से
मठ,मन्दिर शिखर सुशोभित हेै शिखरों के शीश सरायों में
व्यभिचार प्रचार, प्रसार यहाॅं ,काषाय वस्त्र के सायों में

इस देव. भूमि में मानवत को बसने का अधिकार नही है
यहाॅं रमण स्थली देवों की विषय, काम व्यभिचार नही है
ये प्रणय प्रेम का आलय है, अश्लील अधम व्यापार नही है
निष्कपट व्योम की छाया है,किंचित भी धुंध बयार नही है

अभिषाप मौन है शिखरों के नालायक समझ नही पाये
ये दण्ड, प्रचण्ड, घमण्डों का प्रलाप प्रलय मानव खाये
ये मौन वेदना कुदरत की संवेदन सुर की बाणी है
नतमस्तक मौन हिमालय का अभिषाप धरा में प्राणी है!!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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