अल्लाह के मल्लाह
जाकिर नाइक पकड के माइक देखो कितना बोल रहा है
जहा मुहम्मद चूक गये थे,ये वंही से आगे खोल रहा है
वेद,शास्त्र,गीता ,रामायण को कुरूआन से तोल रहा है
आतंकवाद का कट्टरपन से दिल दीवाना डोल रहा हेै
कुछ कीडों को ओसामा भी इसी ज्ञान से पाल रहा था
इसी ज्ञान को ढाल बनाकर मासूमो को ढाल रहा था
आतंकी विस्फोट बना कर जेहादों में डाल रहा था
मासूमो का खून बहाकर अल्लाह को खंगाल रहा था
अल्लाह,ईश्वर की परिभांषा, कीडे हमको समझायेंगे
क्या खून,खराबों की आयत को रमजानो में गायेंगे
क्या नोै-जवान को भटका करके, खूनी नदी बहायेंगे
सम्प्रदाय,मजहब से क्या अब सभी निशाचर आयेंगे
इन शब्दो के सौदागर का अल्लाह, मल्लाह बन जाता हेै
मजहब का जेहाद वतन में खून - खराबा फैलाता है
अब हर चैनल तैय्यार खडा है चिन्गारी भडकाने को
तैय्यार खडी है अहिसुष्णता, सहिसुष्णता पाने को
ऐसे दरवेश दरिन्दो का ना मजहब ठौर ठिकाना हो
एसे परहीन परिन्दो का ना धर्म में आना -जाना हो
इन जाहिल जिस्म-फरोसों का तालीम ना ताना बाना हो
प्रेम, प्यार हो मजहब में, बस मजहब एक घराना हो
अब क्या दिखलाना चाहते हैं ये नकली अमली जामो से
क्यो निर्दोशों को मार रहे हैं ये अल्लाह के पैगामो से
किस धर्म-ग्रन्थ में कंहा लिखा है,खूनी नदि बहाने का
ये सब मौका ढूंढ रहे है, बस,आतकवाद पनपाने का
जितने भी आतंक हुये सब मजहब से क्यों आते हैं
क्यों हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख ईसाइ सम्प्रदाय भडकाते हेै
इन वाणी - भूषण ,बुद्वि - बल्लभ का उपचार जरूरी है
कवि आग तो लिखता है, बस,लिखने की मजबूरी है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815

No comments:
Post a Comment