Tuesday, October 20, 2015

                            रामलीला
भरत शत्रुघ्न राम लखन  का  प्रेम  कभी  अपनाया तुूमने
माँ कैकयी के र्ककश स्वर में, राम भक्ति  को  पाया तुमने
और  सुमित्रा  कौशल्या  का  घाव  कभी  सहलाया तुमने
दशरथ की उस विरह वेदना को  व्याकुल  हो पाया तुमने
पाँच हजार  सालो  से  हम सब राम कथा को बाँच रहे हैं
चौराहो  पर  बस  मन्दिर  हैं  पागल  होकर  नाच  रहे हैं
धर्म कर्म ऋषि मुनि की रक्षा में तुमने  अवधेश  को देखा
यति  सति  माता  सीता  पर  मर्यादा  की  लक्ष्मण रेखा
बनवास अवध के भ्रात भरत ने,राज्य सिंहासन को छोडा
वैभवता  सम्पन्न   विरक्ति   से   तप   का   नाता  जोडा
विवाह सूत्र  मे  बंध  कर  प्रभू  ने  बह्मचर्य  को  अपनाया
छप्पन भोग  छोडकर  प्रभू  ने,  कन्द  मूल वन मे खाया
आज  सभी   तोते रामायण , चौराहे   घर - घर  गाते है
मन्दिर,मस्जिद के झगडो से  भगवानो  के  क्या नाते है
लावारिस बजरंग बलि की औलाद  भूख  से  मर जाती हेै
हनुमान चालीसा मगल को  भारत  की  जनता गाती है
राम चरित्र को आत्मसात कर, जीवन में अपनाया होता
भाईचारा, अमन  शान्ति  का  गीत  देश  में  गाया होता
अगडे पिछडे,  उँच  नीच  सब  सम  दृष्टि  सूतुल्य  बनाते
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई मिलकर रामलला को गाते
मुझको भी ये समझ में आता   राम   घर-घर  जिन्दा है
धर्म सही हो हर विरोध की,हर मजहब  में  भी निन्दा है
रावण को कब तक फूंकोगे, वो  तो दिल  मे  विद्यमान है
कुम्भकरण, मारीच सुबाहू, आज हमारी  आन - बान है
मानवता की नौका में  प्रभू  राम, लखन  और  सीता हों
हर मजहब  में  रामायण और  घनश्याम  की  गीता हो
आततायी , रावण,   कंशो   से  धर्म - कर्म  के ज्ञानी हों
राम,  कृष्ण  अवतार  पुनः  हो,  ऐसी  कौम  कहानी हो
धर्म कर्म   की  धरती  में  आडम्बर  साकार  नही होता
फटी छिद्र   की  नौका   से  सागर  भी   पार  नही होता
महापुरूषों के  जीवन  को  जीवन  शैली   में   अपनाओ
रामलीला के सीजन मे कुछ,  कवि  आग  को भी गाओ।।
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                 मो09897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

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