श्री अरूण शर्मा जी के प्रयास पर
पानी,जवानी की रवानी
रोकने से हिमनदो के वेग रूक सकते नही
तूफान से पाषाण पर्वत के भी झुक सकते नही
पंख लगने पर परिन्दा खुद पलायन मांगता है
प्रवासियो को क्यों सियासी पिंजरो में टांगता है
ये शिखर तो भुखमरी, बे - रोजगारी झेलता है
र्निदयी मंहगायी के भी दंश से ये खेलता है
क्या बचा है इन पहाडों में जवानी के लिये
श्रोत की नदियां बहुत हेै,फिर मौत पानी के लिये
लकडिया मुमकिन नही लाशें जलाने के लिये
दो - वक्त की रोटी नही है आज खाने के लिये
बूढी निगाहें बांझ खेती देख करके रो रही है
देख लो सौन्दर्य की चर्चा चमन में हो रही है
शिक्षा,चिकित्सा भी सियासी फाइलों में पल रही है
पर्यटन , अय्यासियों की राफ्टिंग से चल रही है
भटकी जवानी पर्वतो की खाक ही तो छानती है
ये सियासत भी जवानो के जिगर को जानती है
अगर जवानी रोकनी हो ,तो शोध होना चाहिये
हर पथों पर भ्रष्टता का अवरोध होना चाहिये
पर्वतो की पीर का भी कुछ बोध होना चाहिये
स्नेह का प्रतिभाओ से भी अनुरोध होना चाहिये
साधन सुलभता आज की जिन्दा जवानी माँगती है
ये जवानी स्वप्न की सौगात घर में टाँगती है
बस,जरा सा हो सहारा,हर शिखर पर काम का
फिर दिखेगा पर्वतों पर भी अजूबा चाम का
मैदान से तो अब पलायन पर्वतों को हो रहा है
पानी जवानी को सियासी हरकतों से खो रहा है
संकल्प हो उत्थान का तो, ये जवानी खुद झुकेगी
हर लपट में आग हो तो ये रवानी खुद रूकेगी।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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