Saturday, October 10, 2015

प्रयास
एक भी जिन्दा हो तो मुर्दो को जगा देता है
रोशन दिया हो एक तो तम को भी भगा देता है
दरिया में धार हो तो तट खुद को लगा देता है
तरणी में छेद हो तो साहिल को दगा देता है

उठता है एक पग ,पथ खुद ही निकल आता हेै
बे - होस जॅंवा हो तो लक्षों से भटक जाता है
बनता है होंसला तो रग - रग में समाता है
मंजिल का भरोशा ही तो रस्तों को बनाता है

र्निबल की हल - चलों में वह भाव नही है
वतन की भावना में अब चाव नही है
दरिया समन्दरों में अब नाव नही है
वो धूप भी नही है , वो छाॅंव नही है

जवानों की जवानी भी तो पानी में बह रही है
आबरू वतन की ,सब कुछ क्याें सह रही है
इतिहास के दरिया में कहानी क्यों रह रही है
गुमशुम रवानी वक्त की चुप हो के कह रही है

गीता , कूरान, बाईबिल बे - कार हो गयी है
तालीम पुराणों की समय पार हो गयी है
चारण की कविताए अब श्रृंगार हो गयी हैं
नई नश्ल देश में क्यों ,अब भार हो गयी है

लिखता हूं हार कर भी जवानी पुकारता हूॅं
कलमो के तीर दिल में चुभा करके मारता हूॅं
सूखी नदी में साहिल , नौका उतारता हूॅ
समन्दर में डूब कर भी खुद को उबारता हूॅं

कौशिश में हूॅं कि कुछ को जगाकर के चल पडॅू
भटके हुओं को साथ लगाकर निकल पडूॅं
कुछ अधमरों में आश की किरण मैं देखता हूॅं
मैं आग हूॅ हर शब्द से अंगार फेंकता हूॅ ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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