लोकतन्त्र के आवारा
आजमखाँ अब राष्ट्रसंघ में मिंया मुलायम फंसे नंग में
अब काशी भी रमी भंग में भारत माता फंसी जंग में
राजनीति अब सडकों पर है सबकी नजरें लडकों पर है
मंहगायी के बोल नही हेैं दाल, प्याज के तोल नही हैं
पूरी दिल्ली अब बिहार में जूतम, पतरम प्यार-यार में
चौराहों पर भौक रहे हेैं अप-शब्दो से छौक रहे हैं
हिन्दू,मुस्लिम की मण्डी है चढी काठ की अब हण्डी है
सब शब्दो से पका रहे हैं जनमत सबको छका रहे हैं
चैनल तोते पाल रहा हेै शब्द सियासी डाल रहा है
पूरी कीमत माँग रहा है अपनी सीमा लाँघ रहा है
भाषण में भी टूच्चा पन है असली डाकू जनगणमन है
ध्याडी में भीडे ढोते हैं मंचो से नेता रोते हैं
लालू और मुलायम समधी, नंगे होकर नाच रहे हैं
यदु-वंश के सारे योद्या ,इन नंगो को बाँच रहे हैं
पासवान भी अगडे-पिछडो का सुर संगम तान रहा है
बी.जे.पी.की सवर्ण छावनी में माँझी पहचान रहा है
स्कूटी और टी. वी, साडी, लैपटाप भी बाँट रहे हैं
शब्दो के सौदागर नंगो में भी नंगे छाँट रहे हैं
खादी में सब खूनी, कतली गाधी बापू को गाते हैं
जनमत के चरखे से नेता सूत कात कर दिखलाते है
जिसके मूह में जो आता है निर्भय होकर बोल रहा है
जनता की औकात को नेता,चौराहों पर तोल रहा है
आधा भारत खबरे सुन कर मन ही मन मे शर्माता हेै
कैसा नेता लोकतन्त्र में जनमत से चुन कर आता है
कवि आग हूँ,लपट पुञ्ज में टुच्चो को ही देख रहा हूँ
मैं भी अपनी कविताओं से शब्दो को ही फेंक रहा हूँ
राजनीति के गिरे मूल्य को,देख-देख लज्जित होता हूँ
फिर भी मैं कविताएं गाकर अपनी प्रतिभा को खोता हूँ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

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