नवरात्र पर माता से निवेदन
दुर्गा-स्तूति
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
कूपात्र,मालिक बन बैठे,इन पर कुछ तो मार करो ना
महिसासुर से बडे़ - बडे़ ये असुर देश में घूम रहे हैं
चोर, उचक्के, डाकू सारे, सन्त भेष में झूम रहे हैं
हे,रणचण्डी,नष्ट करो ना, इनको सीमा पार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
तुम भी ये सब देख रही हो, कोैन देश को लूट रहा है
जांति-पांति के कौम, कबीलो से भारत को कूट रहा है
सम्प्रदाय के सारे मजहब इन दुष्टों को पाल रहे हैं
डेढ़ अरब के जनमत भी तो सच्चायी को टाल रहे हैं
हे,महिसासुर मर्दनी काटो, इनके टुकडे़ चार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
चौराहों पर भाषण देखो, अप -शब्दों की बौछारें हैं
आग बरसते हर लब्जों में, अंगारे ही अंगारें हैं
सारे डाकू एक दूसरे की पोलों को खोल रहे हैं
भारत भाग्य विधाता भी तो ये खुद को ही बोल रहे हैं
हे कामाख्या,हे कात्यायिनी ,इनके उपर वार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
कुछ पागल हैं,इनको भी तो,अल्लाह, ईश्वर मान रहे हैं
गणनायक,शंकरगण बनकर, ये भी सीना तान रहे हैें
यति,सति का रूप लिये भी व्यभिचारीणी नाच रही हैं
बनी हुयी हैं, सब रणचण्डी, सप्तसती को बांच रही हैं
इनको भी सद्-बुद्वि देकर नारी का श्रृंगार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
सब के सब आवारा भटके, राजनीति में क्यों आते हैं
हे राजेश्वरी ,तेरी महिमा, गा - गा कर भारत खाते हैं
ये व्यभिचारी,कीर्तन और जगरातों में ही क्यों मिलते हैं
झुण्ड देख कर, मुण्ड पिचासों के ये भीडों में हिलते हैं
लेकर खडग हाथ में माता,इन पर भी प्रहार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
कुछ बाबा भी सत्य सनातन छोड़ के नंगे नाच रहे हैं
राजनीति के अहंकार में, स्वाभिमान को बांच रहे हैं
ऋषि, मुनियों की मर्यादा को चौराहे में बेच रहे हैं
खुद को त्यागी और विरक्ती कहकर माया खेैंच रहे हैं
ऐसे कालनीमि को माता , फाड़के टुकडे़ चार करो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना
जाति,मजहब,के कौम कबीले, संप्रदाय भी सबके काटो
ये भारत के रक्त -बीज हैं, खून सभी का पूरा चाटो
बीज नष्ट करदो माँ इनका ये धरती पर फिर ना आयें
मनवता में भेद बढा कर फिर से ना मानवता खांये
कवि‘आग’के शब्दों में माँ, थोडी सी वो धार धरो ना
नवरात्र है, हे माँ दुर्गा दुष्टों का संहार करो ना।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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