Tuesday, October 6, 2015

सियासी आडम्बर
गाय हमारी माता है , साण्ड हमारा बाप है
माँ, बाप की सेवा करना कलियुग में अभिशाप हेै
भैंस सभी की मौसी है, फिर भैंसा क्यों दोषी है
कुछ बकरी के रिस्ते हैं, खाते रोज फरिस्ते हैं

मुर्गी, बत्तख, तितर, भी तो काम हमारे आते हैं
मछली खाने वालो के भी ढूँढो किससे नाते हैं
कुत्ते, बिल्ली, हिरन, सूंवर, खाने वाले खा जाते हैं
डेढ अरब में साँप, नेवले कछुवे, बिच्छू, भी भाते है

परम्परायें आज नही हैं, पुरातत्व से चलकर आयी
पाषाणकाल की मजबूरी ने, दुनियां में ये रीत चलायी
अन्न नही था इस धरती में, केवल माँस सहारा था
फिर भी कुदरत बची हुयी थी, मानव कितना प्यारा था

ना मजहब थे कौम,कबीले ,सम्प्रदाय की बात नही थी
मानवता में दानवता की नर-भक्षों सी घात नही थी
अनपढ थे ,पर सरल चित्त थे,विरह वेदना भाँप रहे थे
कुत्सित कर्मो की कम्पन से हृदय सबके काँप रहे थे

आज देश में मानव तो हेै, मानवता ,इन्शान नही है
आर्य-खण्ड जैसा ये भारत,अब भी हिन्दुस्तान नही है
शिक्षा दीक्षा, विद्यालय हैं, नई पीढी क्यों भटक रही है
राजनीति क्यों नई पीढी को अजगर जैसे सटक रही है

आज सभ्यता है पर मानव मानवता को काट रहा है
जाति,मजहब के कौम कबीलों में मानव को बाँट रहा हेै
इन झगडो में,मैं भारत का नाश हुआ ही देख रहा हूँ
निष्फल शब्दो के छन्दो को,आग लगाकर फैंक रहा हूँ
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
मो098973998
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment