Wednesday, October 28, 2015

सब्सीडी
वेतन, भत्ते, पेन्शन छोडो मैं भी सब्सीडी छोडूंगा
मैं गरीब हूँ,पर गरीब के साथ स्वंय को भी जोडूंगा
सरकारी सुविधाएं सारी तुम सब मिलकर चाट रहे हो
अरे सियासी अन्धो रेवडियां अपने में बाँट रहे हो

मंहगायी और भ्रष्टाचारी का तुमको कुछ ज्ञान नही है
देश की हालत बिगड रहीहै तुमको ये अनुमान नही हेै
ठाट-बाट में जीने वालों हमको मत उपदेश सुनाओ
खून राष्ट्र का पीने वालों अब तो राष्ट्र - गीत मत गाओ

तुम्हे देश से क्या लेना है, बस, अहंकार में फूल रहे हो
पद के मद में कद को लेकर,हद से उपर झूल रहे हो
बडे - बडे प्रतापी जनमत की ताकत से गिर जाते हैं
यही वोट तो धूल सडक की नेताओं को चटवाते हैं

व्यवसायी के गोदामों में दालों के अम्बार लगे हैं
चन्दा देने वाले डाकू, सब नेता के खास सगे हैं
भारत माता के कूपूत ही ,खून गरीब का चाट रहे हैं
चोर चकारी की माया को राजनीति में बाँट रहे है

नेता और अधिकारी सारे, इस धन्धे में सहयोगी हैं
मरी हुयी जनता और जनमत,भारत में ही क्यों रोगी हैं
मत मारो ये झूठे छापे, जनता को बस, खुला छोड दो
भ्रष्टाचारों के विराध में जनता को कुछ नया मोड दो

कानूनो से ज्यादा सक्षम जनता सब कुछ जान रही है
चोरों के गोदाम कंहा है,ये सब कुछ पहचान रही है
थोडी सी भी हिम्मत हो तो जनता पर ये भार डाल दो
भ्रष्टाचारों के विरोध में, जनमत को ये धार, चाल दो

सरकारी सुख, सुविधा सारी राजनीति में कैद पडी है
चोर डाकुओं की रक्षा में सरकारे मुस्तैद खडी है
मुझे बताओ ये सब्सीडी के नाटक कब तक खेलोगे
हे बे-शर्मो कवि आग की लपटों को कितना झेलोगे।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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