Wednesday, October 21, 2015

हिन्दी का अस्त काल
सच्चायी के लिखने पर भी लोग मुझे गाली देते हैं
जो देश को लूट रहे हैं, उस पर सब ताली देते हेैं
मेरा केवल जुुर्म यही हेै, कुछ जिन्दों को जगा रहा हूँ
केवल कविता से ही तो मैं राष्ट्र-द्रोह को भगा रहा हूँ

श्रृंगार रसों से काम-वाशना को भी मैं भडका सकता हूँ
काम देव के घने-घनो को बे- मौसम कडका सकता हू
बिना ज्ञान के डेढ अरब की भीड सभी हम झेल रहे हैं
दुर्भाग्य है हम सब नेताओं के हाथो खेल रहे हैं

मै तो केवल हर घटना की घटनाओं को बोल रहा हूँ
सच्चायी कर्कस शब्दों में, निर्भय हो कर खोल रहा हूँ
मंहगे-मंहगे राष्ट्र - कवि की,मरी कलम चुपचाप पडी हेै
सभी विदेश में घूम रहे हैं,घर में हिन्दी मौन खडी हेेै

कुछ के हृदय को लगती हेेै,धन्यवाद मिल ही जाता हेेै
ये शब्द व्यंग की विरह वेदना,भारत की गोैरव गाथा हेै
कविता लिखकर गाली खाना ये कोई मेरा शौक नही हेै
भारत मेरा स्वाभिमान हेै, अमरीका का चौक नही हेै

तर्क-कुतर्कों से श्रोता के, हरदम मुझको धार मिली हेेै
माँ शारदा की प्रेरणा से चिन्गारी, अंगार मिली हेै
गलत सही के चिन्तन से ही,शोलो की कविता गाता हूँ
शब्दों की बंजर धरती में,अग्नि छन्द हल चलवाता हू

मैं कवि आग हूँ,अगारो में जलकर भी सिर खपा रहा हूँ
निर्विघ्न हो भारत माता,खुद को खुद में तपा रहा हूँ
हर मशले पर नग्न शब्द से,जनमत कुण्ठा फेंक रहा हूँ
जलने वाले कंहा बचे हेैं , बुझी राख ही देख रहा हूँ

मैं दिनकर की बुझी आग में फिर से शोले डाल रहा हूं
मैं दिनकर की दधिची अस्तिय़ां,शब्दों में खंगाल रहा हूं
इस हिन्दी के अस्त काल को हाथ लगाकर थाम रहा हूं
बीस साल से य़ज्ञ वेदी में बैठा हूं नाकाम रहा हूं

मुझको कोई पढे-गढे या हास्य व्यंग का मजा लूट ले
बिना चबाए शब्द व्यंग को, नीरस हो कर सदा घूंट ले
राष्ट्रभक्ति की इस फितरत में,शब्दो से ही तो जिन्दा हूँ
मैं कवि आग हूँ,राख देखकर, ऱाष्ट्र- कवि से शर्मिन्दा हूँ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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