कविता में कान्ति
अगर मैं भी सियासत में भागीदार हो जाऊँ
धधकती आँच से निकली कविता मञ्च से गाउँ
जुमलों से लचीले छन्द रचनाओं के समझाऊँ
अलंकृत शब्द रसना के डुबो कविता में नहलाऊँ
सियासत की ये सूखी घास जलकर राख हो जाये
सपना है सियासत में कोई जिन्दा कवि आये
ये चारण,भाट अय्यासी के गीतों को अगर छोडें
सभी सरिता की धाराएं अगर खुदगर्ज पर मोडें
कबीले,कौम,मजहब की मिली दीवार को तोडें
ये भटके झुण्ड डारों के सलीके से पुनः जोडें
हलालों की,दलालों की, हूकूमत खाक हो जाये
सपना है सियासत में कोई जिन्दा कवि आये
बयानी आश्वाशन की, वजीरों के ही जुमले हैं
सियासत में दरख्तो को उगाने के ये गमले हैं
यंहा जंगल पनपते है,सियासत की जमीनों में
केवल भीड कटती है, दरिन्दों में, कमीनो में
कोई जिन्दा परिन्दा हो तो ये सब पाक हो जाये
सपना है सियासत में कोई जिन्दा कवि आये
वतन की आबरू कब तक ये बूढे ही संभालेंगे
अपनी नश्ल को कब तक सियासत से ये पालेंगे
वतन कब तक ये भ्रष्टाचार,मंहगायी को झेलेगा
इनके हाथ में यौवन अब कितना और खेलेगा
जवानी जागती हो तो ,ये बूढे फाक हो जाये
सपना है सियासत में कोई जिन्दा कवि आये
हिन्दुस्तान में पढकर, क्या बे-रोजगार घूमेंगे
सियासी सर्कसों में हम जोकर बन के झूमेंगे
ये शब्दो के हैं सौदागर हमेें कब तक निचोडेंगे
हम काल्हू के बैलों सा अब कितना और दौडेंगे
कविता आग की हो या तरन्नुम में गजल गाये
सपना है सियासत मे कोई जिन्दा कवि आये।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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