श्राद्ध-पक्ष में विशेष उपहार
श्राद्ध में श्रद्धा
कितने अच्छे, बूरे मर गये, कंहा तलक गुणगान मे गांउ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
केवल अपने खान दान का, श्राद्ध सभी मिल मना रहे हैं
मरे राष्ट्र के खातिर हम पर, उनको हम क्या जना रहे हैं
निजी स्वार्थ की परम्परा से कैसे मैं छुटकारा पाउँ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
हम सब अपने आदर्शो को भाव-भक्ति से मान रहे हैं
श्राद्व पक्ष की इस बेला में, क्या श्रद्धा से जान रहे हैं
भगतसिह,शेखर,सूभाष की तिथियों को भी खोजा होता
बिसमिल्लाह,अब्दुल हमीद का राष्ट्र भक्ति से रोजा होता
ऐसे सुन्दर आदर्शो पर मैं चाहता हूँ, खुदी समांउ
श्राद्व - पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
निजी स्वार्थ का श्राद्ध-पक्ष, अपराध बोध मुझको होता है
परम्पराओं की सीमा को आज सनातन क्यों ढोता है
वशुधैव कुटुम्ब की इस भांषा को हम शदियो से गाते आये
एक उदाहरण मुझे बताओ, वीरों के कब श्राद्ध मनाये
इस पर भी कई तर्क मिलेगें ,हृदय भाव कैसे समझाउ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
राम, कृष्ण, महावीर, बुद्व ने भी तो अपना तन त्यागा है
उनका श्राद्ध मनाने वाला कोई हिन्दू, क्या जागा है
वैमनस्य में भगवानो को, हम झूलूश में ढोते आये
मुझे बताओ किस हिन्दू ने अब तक उनके श्राद्ध मनाये
महापुरूषों का श्राद्ध मनाने वालो पर मैं शीश नवांउ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
राजनीति के सभी दलों के अपने-अपने अलग बाप है
श्राद्व-पक्ष की प्रेत योनि में लावारिस हैं अभिशाप हैं
थोडा सा गंगा जल उनकी शव-शैय्या पर डाला होता
उनको भी घर के बूढों की श्रद्वा जैसा पाला होता
सावरकर हो,जय प्रकाश हो, लोहिया हो या कुशा भाऊ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ
अगर दूसरों की श्रद्धा भी श्राद्ध - पक्ष में शामिल कर दें
ये मौेका है,आओ मिलकर, प्यार हृदय में सबके भर दे
जिसने जो अहसान किया है,आओ उस पर पुष्प चढायें
उनका भी तर्पण, अर्पण हो, मिलकर ऐसी रीत चलायें
कवि आग सौहार्द,श्राद्ध की इस परिणीति में भी बलि जांउ
श्राद्व-पक्ष है मुझे बताओ किस-किस का मैं श्राद्ध मनांउ।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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