Sunday, October 18, 2015

अपमान में सम्मान
स्वाभिमान जब गिरता हेै सम्मान स्वंय गिर जाता हेै
बुद्वि - बल्लभ का ये विरोध ही समराता का नाता है
जो समाज पर लिखता हो,वो विघटन देख नही सकता
सत्ता की और,सियासत की अग्नि भी सेंक नही सकता

पुरूष्कार का महत्व नही, मतलब है राष्ट्र सुरक्षा का
क्यों सत्ता सौदा करती है,प्रज्ञा की प्रतिभा कक्षा का
साहित्य हृदय का उद्गम है,जो धार कलम की कहती हेै
दुर्भाग्य सियासी कीचड में, कलम, इलम की बहती है

जिनको साहित्य का ज्ञान नही ,साहित्य रत्न वो बाँटेगे
चारण और भाट चकल्लस को, नेता रत्नो में छाँटेगे
अब तो जुगाड की परम्परा से पुरूष्कार मिल जाते हेैं
छंटे छंटाये भारत के अब इस परिधी में आते हैं

विरोध हो रचना से रचकर ,जो रचना खुद ही समझाये
क्या कारण है जो सत्ता ने प्रपञ्च शहर में फैलाये
धार कलम की खुद लिखे, इस रोद्र विभत्सा को काटे
साहित्य सुधा की सरिता के सम्मान सडक पर ना बाँटे

हल्के-हल्के उपहारों से, हल्का पन खुल कर आता है
जो जुगाड से मिलता है, रंग-मंच सदा शर्माता है
प्रतिभा के आगे प्रतिमा की कीमत खुद ही गिर जाती है
साहित्य जगत के जलधी में ये परम्परा क्यों आती है

मैं खुश हूँ,कि साहित्य जगा, पर दुःखद तरीका अपनाया
मुझ जैसे छोटे कवियों को ये भाव समझ में ना आया
हो विरोध हर घटना पर कवि, लेखक की तैयारी हो
प्रज्ञा,प्रतिभा से कवि आग सम्मान ना इतना भारी हो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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