Saturday, October 24, 2015

है, खटकता एक सब की आँख पर
शोभता है , दूसरा सुर, शीश पर
कुल की बडाई किस तरह से काम दे
जो ,जरा भी हो बडप्पन की कसर

कू-कृत्य में साहित्य
साहित्य के शोले सडक पर आ रहे हैं
अब सरस्वति को पुत्र उनको खा रहे हैं
जो कलम थी हाथ में अब कांपती हेै
क्या शारदा इन चारणों को भांपती है

सम्मान पाने की सभी में होड है
अब ये कहानी भी बडी बेजोड है
ऱाष्ट्र के लेखक कवि क्या बोलते हैं
सम्मान को भी अब सियासी तोलते हैं

विरोध में केवल कलम ही बोलती है
ये वो तुला है जो समर को तोलती है
सरस्वति को क्यों सडक पर छोडते हो
सल्तनत संस्कार की क्यो तोडते हो

तोते सियासी तर्क करते जा रहे हैं
अपमान से सम्मान मरते जा रहे हैं
ये शब्द के , बाजीगरों की सर्कसें हैं
कल्पना, सन्धान, सर की तरकसे हेैं

कष्ट होता है कवि, किल्कारियों से
खो गया साहित्य क्यों व्यापारियों से
साहित्य का सम्मान तो खुद बोलता है
क्या दीन होकर इस तरह से डोलता है

क्या सूर,तुलसी,जायसी छिप जायेगा
क्या कबीरा भी सडक पर आयेगा
क्या प्रेमचन्द को छोड सकते हो कभी
सम्मान से मग मोड सकते हो कभी

साहित्य को सम्मान के मद से ना जोडो
सम्मान को सत्ता के पद से ना मरोडो
साहित्य को सम्मान की हद से ना तोडो
आग की मानो,तो बस कद को निचोडो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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