Friday, October 16, 2015

                            और कितना
हमसे  ज्यादा  देश  की   हालत  नेता  ही  तो  भाँप रहे हैं
नेता ही क्यों  मस्ती  में  है, जनमत  ही  क्यों काँप रहे हैं
नही  हैशियत  करने  की,तो क्यों  भाशण ही झाड रहे हो 
अपनी  आशा, तृष्णा, से  क्यों  हम  मुर्दो  को ताड रहे हो
अच्छे   दिन  में  जीने  वाले चमचे  ही  मूँह  खोल  रहे हैं
उल्टा,  सीधा  जो  भी  मूँह   में  आता  हैे, वो  बोल  रहे हैं
कंही मंहगायी, कंही सूखा है, कंही  आधा  भारत भूखा है
कंही हिन्दू मुस्लिम झगडो ने,बेगुनाह घरो  को  फूंका है
कुछ  मुस्लिम    ठेकेदारी   है, वो  फतवा  रोज सुनाते हैं
कुछ  ठेकेदार  हैं   हिन्दू  के,  वो  रोज  आग  सुलगाते हेैं
यंहा  आदमी   मुस्किल  से  दो - वक्त   की  रोटी खाता है
नेता  की  हरकत  ऐसी  है  घर - घर  में  आग लगाता हेै
ये प्रजातन्त्र है  टुच्चों   का   जो   हमसे  चुनकर आता है
क्यों पाँच साल तक  ये  मुर्दा  बस, लाश  हमारी खाता है
देश की हालत बदतर है,  क्या  इनको  ये   अनुमान नही
ये चन्दा कैसे  मिलता हेै, क्या  इसकी  भी  पहचान नही
अब तोड - जोड के  शब्दो  से  कितना  उत्पात मचाओगे
इस  डेढ  अरब  की  भीडों  में  कितने  मुर्दो  को  खाओगे
अच्छी - अच्छी  बातों  से   घर   का   विस्तार  नही होता
सूखी   नदियों   से  साहिल  का  बेडा  भी  पार नही होता
शब्दो की मण्डी से  निकलो, इन  भीडों  का  उपचार करो
जिस जनमत से खडे हुये,उस जनमत से भी प्यार करो
मूूूूँह बन्द करो सख्तायी से जो  घर  में  आग लगाता हो
सत्ता  से  बाहर  करो  उसको जो  सम्प्रदाय  भडकाता हो
सौ दिन  तुमने  ही  मांगे थे, ये जनता पर एहसान नहीं
संकल्प तुम्ही ने दोहराया,ये  जनमत  का फरमान नही
एक  भी  मशला  हल  होता,मूंह  बन्द  हमारा  हो जाता
कवि आग क्यों  जनता  के भावो  को  कविता  में गाता
अगर  हूकूमत  अच्छी  है  तो  चोरों   की   औकात  नही
संकल्प शक्ति  हो  मुखिया  में  तो  भ्रष्टाचारी  बात नही
निर्णय कुछ कठिन जरूरी है,गर  देश  बचाना चाहते हो
कवि  आग  क्यों   सूखे  में,  शब्दो  की   नदी  बहाते हो।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                     9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

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