Saturday, October 24, 2015

बहुत कष्ट हुआ जब मैंने इस राष्ट्र के फनकार मुनव्वर राणा की आँखों में आँशू देखे,उन्ही आँशुओं में भिगोकर कर कुछ शब्द निचोड रहा हूं।

तूफान में दिय़ा
मुनव्वर तू क्यों रोता हेै,ये धरती क्यों धधकती है
कवि की आँख में आँशू तो चिन्गारी भभकती है
हमें हिन्दू, हमें मुस्लिम बनाकर क्या सुधारोगे
क्या इस देश में अंकुर उगे ,उनको ही मारोेगे

कवि सायर, सियासत से हमेशा दूर रहता है
वो अपने आप में खोया सदा भरपूर रहता है
जो दिल में ही जीते हैं, उन्हे हम रास आते हैं
हम है नूर के बन्दे, वतन के गीत गाते हेैं

हमारी आग जलती है तपन आकाश लेता हेै
जज्बा भी उसी का है,जो जज्बा हमको को देता है
हमारे शब्द की लौ से पत्थर भी पिघलते हैं
यंहा जो नर्म होते है सियासत से ही जलते है

शदियों से हूनर अपना कवियों ने दिखाया है
वतन में सांस चलना ,ये फनकारों का साया है
हमने शौर्य शमशीरों की धारों में लगाया है
कवि का एक ही मजहब, क्या अपना पराया है

हम दहशत की दुनियां में अमन के गीत गाते है
हम तूफान में फंसकर , हमेशा मुस्कराते हेैं
हम मरते हैं तो मर कर भी सदा आबाद रहते हैं
युग कितने बदल जांये, हमारे नाद रहते हैं

दुखः होता है जब अपने ही दिल में चोट करते हैं
जिनको हम समर्पित हैं,उन्ही हाथों से मरते हैं
ना रो सकते ,ना हंस सकते,लहू का घूंट पीते हैं
फिर भी हम थपेडों में सिसक कर रोज जीते हैं

कविता आग लिखता है,मुनव्वर आँख पानी में
कविता आग लिखता है वतन की महरबानी में
कविता आग लिखता है इस दरिया दीवानी में
कविता आग लिखता है, लपटों की रवानी में।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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