प्रजातन्त्र में भगवान
प्रजातन्त्र के लव-कुश को तो वाल्मिकी ही पाल रहे हैं
राजनीति के राम-भक्त सब रावण को खंगाल रहे है
माता सीता,लोकतन्त्र की लोक-लाज से भटक रही है
अंजनी माता हनूमान की पूँछ पकड कर लटक रही है
रावण से तो मन्दोदरी भी,अब तलाक ही माँग रही है
शबरी माँ अब राम लला को,बेर की झाड में टाँग रही है
अहिरावण , हनुमान बना, राम, लखन अगुवा करके
देख विभीषण मरवाता हेै, मेघनाथ को ठगुवा करके
राम लखन के नाक कान अब सूपर्णखाएं काट रही है
बालि और सूग्रीव को तारा, पिया प्रेम सा बाट रही है
यति,सति अब फिल्मी दुनिया में अधनंगी नाच रही हैं
नई पीढी भी कामदेव की रामायण को बाँच रही हेै
यादव सिंह अब जामवन्त हेैं,खुद ही टेन्डर बाँट रहे हेैं
सारी फाइल अंगद लेकर, बैठ कमीशन छाँट रहे हैं
रामलखन की चचा विभिषण, कुम्भकर्ण से रिस्तेदारी
दोनो दल की सेैनाओं में राजनीति कैसी बलिहारी
बजरंग दल अब हनुमान को अपने ढंग से पाल रहा है
शिवसैना भी मकरध्वजों को अपने रंग में ढाल रहा हेै
विश्वा मित्र, सुषैन वैद्य से, कल्प औषधी मांग रहे हैं
गुरूवशिष्ठ भी आज लंगोटी को खूंटी पर ही टांग रहे हैं
कालनिमि अब राष्ट्रसन्त है,भोग,योग से सिखा रहे है
अष्टांगयोग से पातंजलि को, उद्योगों में दिखा रहे है
काम -कला के दश-दश बच्चे,भारत माता झेल रही है
बाबा पीढी ऋषि - मुनि की परम्परा से, खेल रही है
कलियुग में तो रामराज भी कामराज बन कर बैठा हेै
रावण अब चुपचाप खडा है,राम-भक्त खुलकर ऐंठा हेै
सभी विभीषण,राजनीति में राजयोग को छाँट रहे हैं
लंका और अयोध्या मिलकर,आपस में ही बाँट रहे हैं
वो धर्म-युद्व,ये कर्म-युद्व ,सत्ता से निखर के आता हेै
रावण और राम में बैर नही,आपस में दोनाे भ्राता है
बस ,हम तुम जैसे मरते है,इस लोकतन्त्र मैदानो मे
झण्डो की जीवन लीला हेै,योद्या के सर-सन्धानो में
यंहा रावण, राम बनाते हेैे, बस,सत्ता के गलियारों से
यंहा खबर सभी को मिलती हेै,घर-घर में अखवारो से
अब वाक - युद्व ही होता है,बस,सत्ता के समझौते से
कवि आग भी लिखता है ,इस राजनीति को न्यौते से।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
प्रजातन्त्र के लव-कुश को तो वाल्मिकी ही पाल रहे हैं
राजनीति के राम-भक्त सब रावण को खंगाल रहे है
माता सीता,लोकतन्त्र की लोक-लाज से भटक रही है
अंजनी माता हनूमान की पूँछ पकड कर लटक रही है
रावण से तो मन्दोदरी भी,अब तलाक ही माँग रही है
शबरी माँ अब राम लला को,बेर की झाड में टाँग रही है
अहिरावण , हनुमान बना, राम, लखन अगुवा करके
देख विभीषण मरवाता हेै, मेघनाथ को ठगुवा करके
राम लखन के नाक कान अब सूपर्णखाएं काट रही है
बालि और सूग्रीव को तारा, पिया प्रेम सा बाट रही है
यति,सति अब फिल्मी दुनिया में अधनंगी नाच रही हैं
नई पीढी भी कामदेव की रामायण को बाँच रही हेै
यादव सिंह अब जामवन्त हेैं,खुद ही टेन्डर बाँट रहे हेैं
सारी फाइल अंगद लेकर, बैठ कमीशन छाँट रहे हैं
रामलखन की चचा विभिषण, कुम्भकर्ण से रिस्तेदारी
दोनो दल की सेैनाओं में राजनीति कैसी बलिहारी
बजरंग दल अब हनुमान को अपने ढंग से पाल रहा है
शिवसैना भी मकरध्वजों को अपने रंग में ढाल रहा हेै
विश्वा मित्र, सुषैन वैद्य से, कल्प औषधी मांग रहे हैं
गुरूवशिष्ठ भी आज लंगोटी को खूंटी पर ही टांग रहे हैं
कालनिमि अब राष्ट्रसन्त है,भोग,योग से सिखा रहे है
अष्टांगयोग से पातंजलि को, उद्योगों में दिखा रहे है
काम -कला के दश-दश बच्चे,भारत माता झेल रही है
बाबा पीढी ऋषि - मुनि की परम्परा से, खेल रही है
कलियुग में तो रामराज भी कामराज बन कर बैठा हेै
रावण अब चुपचाप खडा है,राम-भक्त खुलकर ऐंठा हेै
सभी विभीषण,राजनीति में राजयोग को छाँट रहे हैं
लंका और अयोध्या मिलकर,आपस में ही बाँट रहे हैं
वो धर्म-युद्व,ये कर्म-युद्व ,सत्ता से निखर के आता हेै
रावण और राम में बैर नही,आपस में दोनाे भ्राता है
बस ,हम तुम जैसे मरते है,इस लोकतन्त्र मैदानो मे
झण्डो की जीवन लीला हेै,योद्या के सर-सन्धानो में
यंहा रावण, राम बनाते हेैे, बस,सत्ता के गलियारों से
यंहा खबर सभी को मिलती हेै,घर-घर में अखवारो से
अब वाक - युद्व ही होता है,बस,सत्ता के समझौते से
कवि आग भी लिखता है ,इस राजनीति को न्यौते से।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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