सुबह-सुबह श्री शंकर देव तिवारी जी का सन्देश मिला कि भाई आग जी राजीव गांधी ने कहा था कि ,केन्द्र से एक रूपैया चलता है और नीचे केवल पन्द्रह पैसे पहुंचते हैं, ये चमत्कार कैसे होता है, इस पर भी कुछ लिखें,भाई शंकर देव तिवारी जी को समर्पित रचना प्रस्तुत कर रहा हूं।
प्रजातन्त्र का जादू
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
शंकर देव तिवारी जी, ये भारत की गौरव गााथा है
बडे-बडे फनकार छिपे है खादी कफन लिबाशों में
कफन हटाकर, अरबो - खरबो देखो इनकी लाशों में
स्वीसबैंक के हर लाकर में गिरवीअब भारत माता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
नंगे-भूखे घर से चलकर राष्ट्र-नियन्ता बन जाते है
प्रजापति,यादवसिह जैसे भी अभियन्ता बन जाते हेै
खूनी,कतली,कालनिमि भी साधू-सन्ता बन जाते है
खुजराहो की गुफा देख ये,सभी अजन्ता बन जाते है
राजनीति में साधू, नेता, कच्छे - नाडे का नाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
अरबखरब की सभी योजना,दिल्ली से पैदलआती हेै
चौराहों में खादी कुर्तो और दल्लो से टकराती है
सारे लेखाकार,सी.ए.सब,गुणा-भाग में लग जाते है
संसद में भी बजट देश का सारे चैनल दिखलाते है
आज मीडिया नेताओ की गौरव -गाथा को गाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
पेट्रोल,डीजल दोनो सस्ते फिर भी मंहगायी जारी है
राजनीति के मन्दिर मेें, साड सदन के क्यों भारी है
जरा गरीब से जाकर पूछो, दो-रोटी कैसे खाता हेै
सरकारी स्कूल का बच्चा, केवल राष्ट्र-गीत गाता हेै
राम,बेर भिलनी के खाये,रामभक्तअब क्या खाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
मित्र तिवारी,राजनीति में, वोटर सबको पनपाता हेै
नेता,व्यवसायी,बाबा का स्वीसबैंक में क्यों खाता है
हम तुम जैसे यही सोचकर इसी फिक्र में मरजाते हैं
गीदड.,कौवे,चील,भेडिये, लाश हमारी क्यो खाते हैं
भाई तिवारी देश का पैसा,हर नेता के घर आता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
हम,तुम जैसे, जाने कितने,इसी सोच में मरे हुये है
मठ,मन्दिर और नेताओं के,नोटों के बोरे भरे हुये है
दुर्दशा,गरीबी मंहगायी,हम तुम ही मिलकर झेलेंगे
ना समझी के जनमत से तो,अब ये चटुवे ही खेलेंगे
कवि आग की हर पंक्ति में,चोरो की गौरव गााथा हेै
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
प्रजातन्त्र का जादू
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
शंकर देव तिवारी जी, ये भारत की गौरव गााथा है
बडे-बडे फनकार छिपे है खादी कफन लिबाशों में
कफन हटाकर, अरबो - खरबो देखो इनकी लाशों में
स्वीसबैंक के हर लाकर में गिरवीअब भारत माता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
नंगे-भूखे घर से चलकर राष्ट्र-नियन्ता बन जाते है
प्रजापति,यादवसिह जैसे भी अभियन्ता बन जाते हेै
खूनी,कतली,कालनिमि भी साधू-सन्ता बन जाते है
खुजराहो की गुफा देख ये,सभी अजन्ता बन जाते है
राजनीति में साधू, नेता, कच्छे - नाडे का नाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
अरबखरब की सभी योजना,दिल्ली से पैदलआती हेै
चौराहों में खादी कुर्तो और दल्लो से टकराती है
सारे लेखाकार,सी.ए.सब,गुणा-भाग में लग जाते है
संसद में भी बजट देश का सारे चैनल दिखलाते है
आज मीडिया नेताओ की गौरव -गाथा को गाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
पेट्रोल,डीजल दोनो सस्ते फिर भी मंहगायी जारी है
राजनीति के मन्दिर मेें, साड सदन के क्यों भारी है
जरा गरीब से जाकर पूछो, दो-रोटी कैसे खाता हेै
सरकारी स्कूल का बच्चा, केवल राष्ट्र-गीत गाता हेै
राम,बेर भिलनी के खाये,रामभक्तअब क्या खाता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
मित्र तिवारी,राजनीति में, वोटर सबको पनपाता हेै
नेता,व्यवसायी,बाबा का स्वीसबैंक में क्यों खाता है
हम तुम जैसे यही सोचकर इसी फिक्र में मरजाते हैं
गीदड.,कौवे,चील,भेडिये, लाश हमारी क्यो खाते हैं
भाई तिवारी देश का पैसा,हर नेता के घर आता है
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै
हम,तुम जैसे, जाने कितने,इसी सोच में मरे हुये है
मठ,मन्दिर और नेताओं के,नोटों के बोरे भरे हुये है
दुर्दशा,गरीबी मंहगायी,हम तुम ही मिलकर झेलेंगे
ना समझी के जनमत से तो,अब ये चटुवे ही खेलेंगे
कवि आग की हर पंक्ति में,चोरो की गौरव गााथा हेै
एक रूपैया चल कर पन्द्रह पैसे कैसे हो जाता हेै।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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