Tuesday, January 20, 2015

              रज में ध्वज
अब मैं  नही  चाहता, मुझे   सम्मान दो
अब मैं  नही  चाहता  मुझे  बलिदान दो
अब मैं  नही  चाहता  शहीदों  का  सफर
अब मैं  तो बस चाहता हूं हिन्दुस्तान दो

हैशियत  क्या    हेेै   मेरी   पहचानता हूं
आज   हिन्दुस्तान   को    मैं  जानता हूं
क्या - क्या  नही   होता   है मेरे नाम से
दुर्भाग्य  है  मैं  फिर भी सीना तानता हूं

लुट गयी  इज्जत , मिली  थी  जो कभी
घुट गयी  कलियां, खिली  थी  जो कभी
अब तो  शवों  पर  फूल  चढते जा रहे हैं
छूट गयी  पोशाक, सिली  थी  जो कभी

क्या कमी  थी  ,मुझ   में , मेरी शान में
क्या  फर्क   हैे  उपवाश   में  रमजान में
क्या  तर्क   है  उस कृष्ण में  रहमान में
क्या हो  रहा   हेै   आज   हिन्दुस्तान में

मैं  तिरंगा   ठूंठ    पर    लटका  हुआ हूं
जज्बात  पर  जर्जर हुआ अटका हुआ हूं
देश  के    हर    भेश   को  पहचानता हूं
मैं  शहीदो   की   तरह    पटका  हुआ हूं

हर  वर्ष   राशन   भाषणों   से  बांटते हैं
उसमें भी  कुछ  अपने, पराये  छांटते हैं
शब्द  में  अतिश्योक्ति   इतनी हो रही है
ये  धरा   केवल   ध्वजों   को  ढो रही है

मुझको   नही   नेता   को सारे देखते हैं
शब्द  से   चैनल   भी    रोटी   सेंकते हैं
विष्लेषणों   में   तर्क   को  ही  ढूंढते हैं
धार  से  ध्वज   को   धरा   में  मूंडते हैं

चौराहों में  कब  तक  मुझे तुम  ढोओगे
सम्मान  मेरा  औेर   कितना   खोओगे
छल  कपट  से  रोज   मरता  जा रहा हॅूं
पथ  में   मेरे   शूल   कब   तक बोओगे

गणतन्त्र  को   कितने   मनाते   हैे यंहा
गिनती  करो, कितने  हैं, जो  आते यंहा
मजबूर   नोैकरशाह   लाइन   में  खडे हैं
वो  कोैन   है  जो   राष्ट्र   स्वर गाते यंहा

गणतन्त्र ,ओबामा  की  शौकत  शान में
हम झुक  गये  अमेरिका  के सम्मान में
अब राष्ट्र  भी  उसकी  सुरक्षा  में  खडा है
इस  देश  में  अब  मैं  नही,  नेता बडा है

आग ही  तो  दर्द  ध्वज  का लिख रहा है
आग ही तो फर्द  ध्वज  का  लिख रहा है
चिन्गारियां   हमको  नजर   आती नहीं
फिर भी ये हमदर्द ध्वज का लिख रहा है।।
        राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  9897399815
   rajendrakikalam.blogspot.com

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