(अगर यह रचना यतार्थ लगे तो अवश्य अपनी टिप्पणी दें )
ध्वजाहंकार
गज भर केे कपडे़ से बंधी है ,आबरु हर देश की
आठ गज के दण्ड में लिपटी हैे भांषा क्लेष की
ध्वज धरा में गाढ़ कर परिचय वतन का हो रहा है
मरती हैं कौमें आन पर कैसा जतन ये हो रहा है
कुछ पागलों की मूढता से गीत भी बनते गये
इन मूढता के गीत से सारे वतन तनते गये
हर वतन के अपने - अपने इस जहां में गीत हैं
कारण यही है बैर का अब हर वतन विपरीत है
हम,पीर और पैगम्बरों को भी ध्वजों से जानते हैं
आवाम भीअस्तित्व अब इन ध्वजों को मानते हैं
पैबन्द का अम्बर यहाॅं अखिलेश है हर भेष में
क्यों मजहबी आका , पताका बन रहा है देश में
शोक में भी झुक रहा है ,राष्ट्र गौरव गान का
क्यों राजनीति में कफन है कौम के सम्मान का
ये! सियासी मृत शवो की रूग्णता को ढो रहा है
राष्ट्र का सम्मान भी अस्तित्व अपना खो रहा है
सरहदों पर भी ध्वजा अब जंग का प्रतीक है
हर तरह के द्वन्द में भी , क्यों ध्वजा सरीक है
हम शपत लेते बस, झण्डा बचाने के लिये
यहाॅं आदमी मजबूर है दो वक्त खाने के लिये
मूढता में हर मजहब भी राष्ट्र से उपर बडा
चर्च,मन्दिर,मस्जिदों पर व्योम को झण्डा चढा
मजहबों ने धर्म को तो ध्वज धूरी पर धर दिया
स्वछन्द सागर प्रेम का पूरा जहर से भर दिया
शान्ति के सम्मेलनों में बात है चैनो- अमन
लहरा रहा अणु बम लपेटे,हर ध्वजा ओढे कफन
विस्फोट लिपटा हैध्वजों में जब हवा में झूमता है
काल बनकर ये ध्वजा भी सरहदों को चूमता है
कहीं राष्ट्र है, कहीं धर्म है ,कितने कबीले कौम है
सब लड. रहें हैं लक्ष्य कर कौन छूता व्योम है
झण्डा धरम का राष्ट्र का गर इस तरह बढता रहेगा
जब तक धरा में श्रृष्टि है इन्सान तो लडता रहेगा !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
ध्वजाहंकार
गज भर केे कपडे़ से बंधी है ,आबरु हर देश की
आठ गज के दण्ड में लिपटी हैे भांषा क्लेष की
ध्वज धरा में गाढ़ कर परिचय वतन का हो रहा है
मरती हैं कौमें आन पर कैसा जतन ये हो रहा है
कुछ पागलों की मूढता से गीत भी बनते गये
इन मूढता के गीत से सारे वतन तनते गये
हर वतन के अपने - अपने इस जहां में गीत हैं
कारण यही है बैर का अब हर वतन विपरीत है
हम,पीर और पैगम्बरों को भी ध्वजों से जानते हैं
आवाम भीअस्तित्व अब इन ध्वजों को मानते हैं
पैबन्द का अम्बर यहाॅं अखिलेश है हर भेष में
क्यों मजहबी आका , पताका बन रहा है देश में
शोक में भी झुक रहा है ,राष्ट्र गौरव गान का
क्यों राजनीति में कफन है कौम के सम्मान का
ये! सियासी मृत शवो की रूग्णता को ढो रहा है
राष्ट्र का सम्मान भी अस्तित्व अपना खो रहा है
सरहदों पर भी ध्वजा अब जंग का प्रतीक है
हर तरह के द्वन्द में भी , क्यों ध्वजा सरीक है
हम शपत लेते बस, झण्डा बचाने के लिये
यहाॅं आदमी मजबूर है दो वक्त खाने के लिये
मूढता में हर मजहब भी राष्ट्र से उपर बडा
चर्च,मन्दिर,मस्जिदों पर व्योम को झण्डा चढा
मजहबों ने धर्म को तो ध्वज धूरी पर धर दिया
स्वछन्द सागर प्रेम का पूरा जहर से भर दिया
शान्ति के सम्मेलनों में बात है चैनो- अमन
लहरा रहा अणु बम लपेटे,हर ध्वजा ओढे कफन
विस्फोट लिपटा हैध्वजों में जब हवा में झूमता है
काल बनकर ये ध्वजा भी सरहदों को चूमता है
कहीं राष्ट्र है, कहीं धर्म है ,कितने कबीले कौम है
सब लड. रहें हैं लक्ष्य कर कौन छूता व्योम है
झण्डा धरम का राष्ट्र का गर इस तरह बढता रहेगा
जब तक धरा में श्रृष्टि है इन्सान तो लडता रहेगा !!
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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