Friday, January 16, 2015

                     दिल्ली की बिल्ली
इस राजनीति में  नई - नई   तस्वीर उभर कर आती है
अब तक जो अनजान  थी जनता  अब वो भी शर्माती है
नयी    तकनीकी    नया   दौर  हैे, नये  नमूने  आयेंगे
फेसबुको से ओैर  ट्वीटर से,ये जन-मत  को भरमायेंगे

रस्ते और  घुमस्ते  रोको , टम - टम गाडी  दस्ते रोको
सन्ता,बन्ता,जनता रोको, अगर मिले  भगवन्ता रोको
आप,बाप के खाप को रोको,भीडों के अभिशाप को रोको
लावारिस इस चाप  को रोको,कोई सडक छाप को रोको

आम आदमी इतना  नंगा, क्यों बनता है खास मतंगा
गंजा   बेच   रहा   है  कंघा,  कवि राज  का  देखो पंगा
लोक-तन्त्र का कीट  पतंगा, सडकों  पर करता  हैे दंगा
हाथ के  उपर  फंसा  हैेे छंगा, बी.जे.पी.का  देख अडंगा

आज केजरीवाल  खडा  है, प्रजा-तन्त्र का काल खडा हेै
घर के अन्दर अलग घडा है,किरण चमकी चांद चढा है
लावारिस  का अलग धडा हेै, टुच्चा इज्जत-दार बडा है
भालू ,बन्दर ,खूब लडा है,लोक-तन्त्र चुप-चाप खडा है

अन्ना छोडा मोदी पकडा,किरण,सादिया का ये लफडा
लालकिले  के  चौराहे  में, हर लावारिस झण्डा अकडा
घर के भेदी सभी विभीषण और जयचन्दो को भी ढूंढो
ये मोदी  का  नया  अखाडा, छांट-छांट  कर  चेले मूंडो

किरण के आगे सारे  दीपक, बुझे-बुझे से झपक रहे हैं
अब मुख्यमंत्री कौन बनेगा,आंसू  सबके टपक  रहे हैं
शब्दों  के  सौदागर  सारे, शब्द  बाण  को  झेल रहे हैं
नया अखाडा बी0जे0पी0 का, बस मोदी ही खेल रहे हैं

अमर सिंह की  चाल  निराली,बी.जे.पी.में चेली डाली
आर.एस.एस.की  खेती को,सींच रहा लावारिस माली
भटकी बिल्ली,चाल,चरित्र, चेहरों  को ही क्यों भाती है
यति,सती तो राजनीति में नगर-वधू भी बन जाती है

अब कांग्रेस की कौरव सैना, मम्मी,पापा झांक रही है
टिकट हाथ में लेकर सैना,रण में थर-थर कांप रही है
भीष्म-पितामाह  कांग्रेस  के  सर सैया में पडे हुये हैं
घोटालों  के  अम्बारों  से , सब  के  सीने जडे  हुये हैं

भारत मां के गीत सुनाओ,गांधी को सडको पर लाओ
सब टी0वी0चैनल में छाओ,आम,खास के गानेगाओ
नारे बोलो  देश बचाओ, राजनीति की आड  में खाओ
दिल्ली को दरवेष बनाओ,दुनिया कोऔकात दिखाओ

वैश्या  वृत्ति, भांड को पकडो, चौराहों सडको पर अकडो
गली,मुहल्ले कांड को पकडो,मुस्टंडों की टांड को पकडो
राम देव ब्रह्माण्ड को पकडो,मोदी  नये ब्राण्ड को पकडो
महगांई है खांड को पकडो,बिखरे चावल मांड को पकडो

संविधान  के  पन्ने  कोरे, खोल  रहे  हैं  सभी  छिछोरे
दक्षिण  काले, उत्तर   गोरे, डाल  रहे  जनमत  पर डोरे
लावारिस  सब  छोरी ,  छोरे, राजनीति की पन्ने कोरे
सब के घर  नोटो के  बोरे,फिर भी हाथ मे भीख कटोरे

मन्दिर, मस्जिद,  गिरजे  न्यारे,  झण्डे उंचे रहे हमारे
सम्प्रदाय सबके  हैं  प्यारे, इनसे  राष्ट्र - ध्वजा भी हारे
सभी  सपूत  भारत  के  प्यारे,  चाट  रहे  हैं  नेता चारे
कवि ‘आग’ के छन्द करारे, फेस - बुकों  में  भटके हारे!!
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
                    मो09897399815
        rajendrakikalam.blogspot.com
               

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