यह रचना उन राष्ट्र कवियों व साहित्यकारों को समर्पित है, जो राष्ट्र के उपर लिखना ही नही चाहते या डरतें हैं या लिखने का हुनर खो बैठे हैं या समय ही नही है या अन्य कोई मजबूरी है,इस कविता के माध्यम से निवेदन कर रहा हूं कि फिर से कलम उठाये और ऱाष्ट्र निर्माण में सहयोग करें।कविता थोडी लम्बी है इसके लिये क्षमा।
साहित्य की विरासत्
हम कवियों ये पंगा ना लो ,कविता सुननी है तो सुनलो
बैठ चैन से सबर घूंट लो ,कविताओं का मजा लूटलो
छॅंटे - छटाये फनकारी है ,एक कवि सब पर भारी है
हूट करोेगे पछताओगे ,कविता से गाली खाओगे
सरहद पर फौजी लडता है ,कवि तो भ्रष्टों से अढता है
व्यभिचारी और राजनीति पे, एक कवि भारी पढता है
हम तो हर-फन के माहिर हैं, नाप तोल के बोल रहे है
हिन्दुस्तानी और दुनिया की औखातों को खोल रहे हैं
भरी भीड में हम वकील हैं राजनीति में गढी कील हैं
बहस अदालत में करते हैं ,शब्दों की खेती चरते हैं
कौन कहाॅं कितना ढोता है ,निर्णय जनता का होता है
ये भारत का संविधान क्यों चोर उच्क्कों का न्योता है
शल्य चिकित्सा की कविताये रोग-भ्रश्ट सारे पढते है
चीर फाडकर भावभंगिमा,सब कुछ कविता से गढते हैं
नासूर बने फुन्सी फोडों को ,संसद के टट्टू घोडों को
काले धन के धनवानो को भारत के हर अपमानों को
कलमों से नंगा करतें हैं ,हम शूर कवि पंगा करते हैं
तुम्हे खोल कर बतलातें हैं, नेता की क्या औखातें हैं
शदीयों से समझाते आये ,लोकतन्त्र के गाने गाये
मुर्दो के आगे रोते है ,हम अपनी ताकत खोते हैं
सबसे अव्वल अभियंता,अखण्ड राष्ट्र निर्माण नियंता
सर्वेक्षण करते जाते हैं ,जनता को सब बतलाते हैं
कौन कहाॅं कितना खाता हैं राजनीति को क्यों भाता हैं
ये भारत की ठेकेदारी क्यों ? मंत्री की रिस्तेदारी
लालकिला हो झोपड पटटी,कविता कूट रही है मट्टी
फीता कौन काटने आया ,मंत्री जी ने कितना खाया
सारा ब्यौरा हम रखते हैं ,हर मंचो से हम बकते हैं
घोटालों को समझाते हैं ,नेता की कितनी जाते हैं
हम सरहद के फौजी हैं ,सुखदुख के कविता खोजी हैं
बन्दूकों से कलम तेज है छल कपटी से सदा परहेज हैं
प्रेम - प्रसारण हम करते हैं ,मरने से भी नही डरते हैं
रस , छन्दों की नीरसता को ,अलंकार से हम भरते हैं
सब देशों का प्रेम - प्यार और गुण्डा गर्दी दिखलाते हैं
मंचो से सारी दुनिया की भाव- भंगिमा को गाते हैं
बिगडी नश्लो की फसलों को हम ही तो कलमी करते हैं
आतंकी दुनिया में जीने वालों को छलनी करते हैं
हर फिल्मों की गीत कहानी इन कलमों से ही आती है
उपन्यास,कविता के दम पर पुरूस्कार फिल्में पाती हैं
चल चित्रों के नृत्य गान में कलम कवि की ही होती है
श्रृंगार रसों के अंगारों से कविता दुनिया को ढेाती हैं
हमसे अच्छा राजनीति का राष्ट्र-नियन्ता नही पाओगे
लालकिला हो गाॅंवजिला हो कविता अपनी ही गाओगे
शब्दों से श्रृंगार भगत का और सूभाष करते आये
शूर - वीर को जोश दिलाकर आजादी के गाने गाये
गाॅंधी ,नेहरू का परचम भी हमने दुनिया में फैलाया
राष्ट्र भक्ति पर मिटने वालों पर भी हमने गीत बनाया
अमर -प्रेम के गीत सहादत के शदियों से गाते आये
विश्व- विजेता के सपने भी भारत को हमने दिखलाये
भ्रष्टाचारी , चोर , उचक्कों को खुलकर नंगा करते हैं
इस धरती के हम सपूत हैं ,इसीलिये पंगा करते हैं
हम समाज पर पैनी नजरों को शदियों से गाढ रहे हैं
हिंदू , मुश्लिम , सिक्ख, इसाई के नकाब उधाड रहे हैं
कवि राष्ट्र,दुनिया का भी प्रतिबिम्बित करता दर्पण है
साहित्य सृजन की दुनिया में पूरा जीवन ही अर्पण है
राष्ट्र भक्त,निर्पेक्ष नियन्ता आज जगत में श्रेष्ठ कवि है
प्रकाश पुंज के प्रसारण का,कवि जगत में श्रेष्ठ रवि है
हम पत्रकार है, संपादक है , डबरों से खबरें लातें हैं
अखण्ड-राष्ट्र जनमानस के दिल दिमाग में फैलातें है
अम्बर जैसी सारी दुनिया एक छत्र के नीचे आये
कौशिश करते है भानू की उर्जा मानव को मिल जाये
सोम एक है व्योम एक है सागर दिनकर कौम एक है
रक्त- माॅंस और हड्डी मज्जा पंच भूत में रोम एक है
जन्म एक मरण एक है आदि अन्त का वरण एक है
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग एक वृत्त है चरण एक है
देशकाल आध्यात्म भाव ,कविताओं का सम्पादन है
आज कवि अखण्ड-राष्ट्र का सूत्रधार है अवलम्बन है
हास्य,व्यंग की कविताओं से दिल सबका बहलातें हैं
हम कविता की अमृत गंगा से नंगों को नहलाते हैं
ये टुच्चों का चौक नही है गाली देना शौक नही है
भ्रष्टों से किसके नाते हैं, राष्ट्र-द्रोह खुलकर गााते हैं
हम भारत को जोड रहे हैं, नेता टुकडे तोड रहे हैं
जनगणमन , अधिनायक हैं,प्रजातंत्र गीता गायक हैं
हास्य व्यंग से हम तोडेगे ,कविताओं से सर फोडेगें
हम शब्दों के सर तूरीण हैं लक्ष्य भेदने में प्रवीण है
छन्दों के घागे में शब्दों के मनको को डाल रहे हैं
दिलदिमाग में घुसकर हम ही कविता को पाल रहे है
कौन,कहाॅं हम से बचता है सोच विचार कर इसको गुनलो
बारीकी से हर विचार को सुंई,धागे से मन में बुनलो
कवि आग की कविताओं से बातें चुननी है तो चुनलो
हम कवियों ये पंगा ना लो कविता सुननी है तो सुनलो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
साहित्य की विरासत्
हम कवियों ये पंगा ना लो ,कविता सुननी है तो सुनलो
बैठ चैन से सबर घूंट लो ,कविताओं का मजा लूटलो
छॅंटे - छटाये फनकारी है ,एक कवि सब पर भारी है
हूट करोेगे पछताओगे ,कविता से गाली खाओगे
सरहद पर फौजी लडता है ,कवि तो भ्रष्टों से अढता है
व्यभिचारी और राजनीति पे, एक कवि भारी पढता है
हम तो हर-फन के माहिर हैं, नाप तोल के बोल रहे है
हिन्दुस्तानी और दुनिया की औखातों को खोल रहे हैं
भरी भीड में हम वकील हैं राजनीति में गढी कील हैं
बहस अदालत में करते हैं ,शब्दों की खेती चरते हैं
कौन कहाॅं कितना ढोता है ,निर्णय जनता का होता है
ये भारत का संविधान क्यों चोर उच्क्कों का न्योता है
शल्य चिकित्सा की कविताये रोग-भ्रश्ट सारे पढते है
चीर फाडकर भावभंगिमा,सब कुछ कविता से गढते हैं
नासूर बने फुन्सी फोडों को ,संसद के टट्टू घोडों को
काले धन के धनवानो को भारत के हर अपमानों को
कलमों से नंगा करतें हैं ,हम शूर कवि पंगा करते हैं
तुम्हे खोल कर बतलातें हैं, नेता की क्या औखातें हैं
शदीयों से समझाते आये ,लोकतन्त्र के गाने गाये
मुर्दो के आगे रोते है ,हम अपनी ताकत खोते हैं
सबसे अव्वल अभियंता,अखण्ड राष्ट्र निर्माण नियंता
सर्वेक्षण करते जाते हैं ,जनता को सब बतलाते हैं
कौन कहाॅं कितना खाता हैं राजनीति को क्यों भाता हैं
ये भारत की ठेकेदारी क्यों ? मंत्री की रिस्तेदारी
लालकिला हो झोपड पटटी,कविता कूट रही है मट्टी
फीता कौन काटने आया ,मंत्री जी ने कितना खाया
सारा ब्यौरा हम रखते हैं ,हर मंचो से हम बकते हैं
घोटालों को समझाते हैं ,नेता की कितनी जाते हैं
हम सरहद के फौजी हैं ,सुखदुख के कविता खोजी हैं
बन्दूकों से कलम तेज है छल कपटी से सदा परहेज हैं
प्रेम - प्रसारण हम करते हैं ,मरने से भी नही डरते हैं
रस , छन्दों की नीरसता को ,अलंकार से हम भरते हैं
सब देशों का प्रेम - प्यार और गुण्डा गर्दी दिखलाते हैं
मंचो से सारी दुनिया की भाव- भंगिमा को गाते हैं
बिगडी नश्लो की फसलों को हम ही तो कलमी करते हैं
आतंकी दुनिया में जीने वालों को छलनी करते हैं
हर फिल्मों की गीत कहानी इन कलमों से ही आती है
उपन्यास,कविता के दम पर पुरूस्कार फिल्में पाती हैं
चल चित्रों के नृत्य गान में कलम कवि की ही होती है
श्रृंगार रसों के अंगारों से कविता दुनिया को ढेाती हैं
हमसे अच्छा राजनीति का राष्ट्र-नियन्ता नही पाओगे
लालकिला हो गाॅंवजिला हो कविता अपनी ही गाओगे
शब्दों से श्रृंगार भगत का और सूभाष करते आये
शूर - वीर को जोश दिलाकर आजादी के गाने गाये
गाॅंधी ,नेहरू का परचम भी हमने दुनिया में फैलाया
राष्ट्र भक्ति पर मिटने वालों पर भी हमने गीत बनाया
अमर -प्रेम के गीत सहादत के शदियों से गाते आये
विश्व- विजेता के सपने भी भारत को हमने दिखलाये
भ्रष्टाचारी , चोर , उचक्कों को खुलकर नंगा करते हैं
इस धरती के हम सपूत हैं ,इसीलिये पंगा करते हैं
हम समाज पर पैनी नजरों को शदियों से गाढ रहे हैं
हिंदू , मुश्लिम , सिक्ख, इसाई के नकाब उधाड रहे हैं
कवि राष्ट्र,दुनिया का भी प्रतिबिम्बित करता दर्पण है
साहित्य सृजन की दुनिया में पूरा जीवन ही अर्पण है
राष्ट्र भक्त,निर्पेक्ष नियन्ता आज जगत में श्रेष्ठ कवि है
प्रकाश पुंज के प्रसारण का,कवि जगत में श्रेष्ठ रवि है
हम पत्रकार है, संपादक है , डबरों से खबरें लातें हैं
अखण्ड-राष्ट्र जनमानस के दिल दिमाग में फैलातें है
अम्बर जैसी सारी दुनिया एक छत्र के नीचे आये
कौशिश करते है भानू की उर्जा मानव को मिल जाये
सोम एक है व्योम एक है सागर दिनकर कौम एक है
रक्त- माॅंस और हड्डी मज्जा पंच भूत में रोम एक है
जन्म एक मरण एक है आदि अन्त का वरण एक है
सतयुग,त्रेता,द्वापर,कलियुग एक वृत्त है चरण एक है
देशकाल आध्यात्म भाव ,कविताओं का सम्पादन है
आज कवि अखण्ड-राष्ट्र का सूत्रधार है अवलम्बन है
हास्य,व्यंग की कविताओं से दिल सबका बहलातें हैं
हम कविता की अमृत गंगा से नंगों को नहलाते हैं
ये टुच्चों का चौक नही है गाली देना शौक नही है
भ्रष्टों से किसके नाते हैं, राष्ट्र-द्रोह खुलकर गााते हैं
हम भारत को जोड रहे हैं, नेता टुकडे तोड रहे हैं
जनगणमन , अधिनायक हैं,प्रजातंत्र गीता गायक हैं
हास्य व्यंग से हम तोडेगे ,कविताओं से सर फोडेगें
हम शब्दों के सर तूरीण हैं लक्ष्य भेदने में प्रवीण है
छन्दों के घागे में शब्दों के मनको को डाल रहे हैं
दिलदिमाग में घुसकर हम ही कविता को पाल रहे है
कौन,कहाॅं हम से बचता है सोच विचार कर इसको गुनलो
बारीकी से हर विचार को सुंई,धागे से मन में बुनलो
कवि आग की कविताओं से बातें चुननी है तो चुनलो
हम कवियों ये पंगा ना लो कविता सुननी है तो सुनलो।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
मो0 9897399815
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