केवल हास्य-व्यंग का मजा लें
क्रव्यूह में अभिमन्यु
चकव्यूह में अभिमन्यु को कौरव सैना घेर रही है
अपने घर की सत्यवती भी बच्चों से मूँह फेर रही है
भीष्म तात, अन्ना सैया पर, पुत्र मोह मे फंसे हुये है
द्रोण, कृपाचार्य कौरव के अंक, पंक में धँसे हुये हेै
धनश्याम भी कुरूक्षेत्र में अपनी मुरली बजा रहे हेै
धृतराष्ट्र तो गान्धारी को हाथ फेर कर सजा रहे है
जयद्रथ, कर्ण,दुशासन तीनो, पूरी दिल्ली छान रहे है
वर्णशंकरी सन्तानो के देखो क्या अरमानन रहे हेै
एक केजरी, पूरा भारत, दिल्ली रण में जुट जाता है
कर्मयुद्व मे राम भक्त का,सत्य सडक में लुट जाता है
घटोत्कच्छ,अमितशाह बेचारे, सीना ताने घूम रहे है
बी. जे. पी के मुख्यमंत्री, चरण मोदी के चूम रहे है
योगी, साधू,सन्यासिन भी, काम क्षेत्र मे कूद पडी है
जाने कितनी, यति, सती भी चौराहे में आज खडी है
स्मृति,सुषमा और शादिया,बेदी के संग चिल्लाती है
कहने को कुछ बचा नही है,ओबामा, मोदी गाती है
कांग्रेस के सभी शिखण्डी, शब्जी मण्डी ढूँढ रहे हैं
नये-नये चेलों को राहुल आँख मूंद कर मूड रहे हैं
झोपड पट्टी को सब पट्टे भाषण में ही बाँट रहे हैं
माँस, मदिरा, वैश्या-गामी, ढूंढ - ढूंढ कर छाट रहे है
आर. एस. एस. के सारे सेवक कर्म युद्व मे लगे पडे हैं
इनके भी कुछ उप समूह है,उनके अपने अलग धडे हैं
धर्म-कर्म के सभी सरगना अभिमन्यु को मार रहे हैं
दिल्ली के इस कूरूक्षेत्र मे, योद्या सब अवतार रहे हैं
सारी जनता अभिमन्यु के रण-कौशल को देखरही है
पूरी दिल्ली छत के उपर से, वोटों को फेंक रही है
केवल नेता ही सडकों पर जमघट लेकर घूम रहे हैं
मजबूरी मे सभी मिडिया,चरण-कमल को चूम रहे है
कौरव,पाण्डव ओैर दुषासन से मेरा भी काम नही है
गान्धारी और द्रोपदीयो से दिल्ली भी अनजान नही हेेै
वब्रूवाहन,घटोत्कच्छ सब लावारिस क्यों भटक रहे है
कुर्सि एक, ये अनेक क्यों,किस आशा से लटक रहे है
कौरव - पाण्डव के इस रण मे जनता कृष्ण मुरारी हेै
दुर्भाग्य, जनमत की शक्ति,आसक्ति से हरदम हारी हेै
मैं भी सजय की दृष्टि से कुरूक्षेत्र को देख रहा हूं
कवि आग हूँ,अंगारो को शब्द बाण से फेंक रहा हू।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
क्रव्यूह में अभिमन्यु
चकव्यूह में अभिमन्यु को कौरव सैना घेर रही है
अपने घर की सत्यवती भी बच्चों से मूँह फेर रही है
भीष्म तात, अन्ना सैया पर, पुत्र मोह मे फंसे हुये है
द्रोण, कृपाचार्य कौरव के अंक, पंक में धँसे हुये हेै
धनश्याम भी कुरूक्षेत्र में अपनी मुरली बजा रहे हेै
धृतराष्ट्र तो गान्धारी को हाथ फेर कर सजा रहे है
जयद्रथ, कर्ण,दुशासन तीनो, पूरी दिल्ली छान रहे है
वर्णशंकरी सन्तानो के देखो क्या अरमानन रहे हेै
एक केजरी, पूरा भारत, दिल्ली रण में जुट जाता है
कर्मयुद्व मे राम भक्त का,सत्य सडक में लुट जाता है
घटोत्कच्छ,अमितशाह बेचारे, सीना ताने घूम रहे है
बी. जे. पी के मुख्यमंत्री, चरण मोदी के चूम रहे है
योगी, साधू,सन्यासिन भी, काम क्षेत्र मे कूद पडी है
जाने कितनी, यति, सती भी चौराहे में आज खडी है
स्मृति,सुषमा और शादिया,बेदी के संग चिल्लाती है
कहने को कुछ बचा नही है,ओबामा, मोदी गाती है
कांग्रेस के सभी शिखण्डी, शब्जी मण्डी ढूँढ रहे हैं
नये-नये चेलों को राहुल आँख मूंद कर मूड रहे हैं
झोपड पट्टी को सब पट्टे भाषण में ही बाँट रहे हैं
माँस, मदिरा, वैश्या-गामी, ढूंढ - ढूंढ कर छाट रहे है
आर. एस. एस. के सारे सेवक कर्म युद्व मे लगे पडे हैं
इनके भी कुछ उप समूह है,उनके अपने अलग धडे हैं
धर्म-कर्म के सभी सरगना अभिमन्यु को मार रहे हैं
दिल्ली के इस कूरूक्षेत्र मे, योद्या सब अवतार रहे हैं
सारी जनता अभिमन्यु के रण-कौशल को देखरही है
पूरी दिल्ली छत के उपर से, वोटों को फेंक रही है
केवल नेता ही सडकों पर जमघट लेकर घूम रहे हैं
मजबूरी मे सभी मिडिया,चरण-कमल को चूम रहे है
कौरव,पाण्डव ओैर दुषासन से मेरा भी काम नही है
गान्धारी और द्रोपदीयो से दिल्ली भी अनजान नही हेेै
वब्रूवाहन,घटोत्कच्छ सब लावारिस क्यों भटक रहे है
कुर्सि एक, ये अनेक क्यों,किस आशा से लटक रहे है
कौरव - पाण्डव के इस रण मे जनता कृष्ण मुरारी हेै
दुर्भाग्य, जनमत की शक्ति,आसक्ति से हरदम हारी हेै
मैं भी सजय की दृष्टि से कुरूक्षेत्र को देख रहा हूं
कवि आग हूँ,अंगारो को शब्द बाण से फेंक रहा हू।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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