Thursday, January 29, 2015

               मुफ्त में लुफ्त
बिजली,पानी  फ्री  में  देंगे ,अब  जुगाड  सब हो जाता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप  का क्या जाता हेै
प्रजातन्त्र  का  गन्दा  नाला   बहते-बहते  रूक  जाता है
राजनीति  के  चरणो  में तो संविधान  भी झुक जाता है
चोर,  चकारी,  गुण्डागर्दी,   लोकतन्त्र   से   ही  आता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै

झोपड. पट्टी, पुल और चट्टी, राजनीति  की सौगातें है
सडक, गूल और नाली,खडुंजे,ये सब फाइल  की बातें है
मलिन बस्तियों का भी पैसा,आपस में  ही बँट जाता हेै
नेता अच्छा हो  तो  कोहरा, भरी  सर्द   में  छँट लाता है
राजनीति  का  राष्ट्र  गीत  तो   केवल  नेता  ही  गाता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

बलात्कार पर रोक लगाओ,मिल जाये तो भोग लगाओ
मंहगायी से जनता मरती, नेता जी तुम खुलकर खाओ
नारी के  आयोग, भोग  को  खुल्लम  खुल्ला झेल रहे हेैं
बलात्कार  के  कानूनो   को  बलात्कार   ही  खेल रहे हैं
किरण बेदी  आई.पी.एस.थी, उसका  तो  इससे नाता हैे
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे  बाप का क्या जाता हेै

चौराहों पर  आज  केजरी, आम  आदमी  खास  हो गया
प्रोफेसर  विस्वास  कवि  था,उसका  सत्यानास हो गया
जाने कितने  पढे  लिखे  थे, अब दिल्ली में आम हो गये
कलतक जो भी  चरित्रवान थे,सडको में बदनाम हो गये
नया-नया तोता पढ लिखकर राजनीति  को सहलाता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

सेवा  से  निवृत्त  हुआ   जो  उनके  तो  अब ठाठ हो गये
गांधी  के  ये  खादी  कुर्ते, अब  मुर्दो   की   हाट   हो गये
साठ  साल  सरकार  को  चूसा, अब  देश को चूस रहे हैं
बे-रोजगार  सडक  में  घूमें, ये  माल  घरों में ठूँस रहे हैं
प्रजातन्त्र  में  हम  मुर्दो  को, ये  मुर्दा  ही   क्यों भाता हेै
जिसका जूता उसी के  सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै

सारे  जोकर  अब  सडकों पर अपनी सर्कस दिखा रहे हैं
सांप, नेवले  दोनो  मिल कर, भाँषा कर्कस  सिखा रहे हैं
सभी  मिडिया, मजा  ले  रहे  हैं  दिल्ली   के   चौराहों में
सिमट गयी है आज सियासत, ओबामा की गलबाहों में
वो  भी  टुकडा,  हवा  में  नंगो  के   उपर  ही  लहराता हेै
जिसका जूता उसी के सिर पे, मेरे बाप का क्या जाता हेै

कितना  ओछी  राजनीति है,धूल सडक की फाँक रही हैेे
प्रजातन्त्र  की  हरकत, नेता  जी  की  आँखे ताक रही हेै
काम वाशना  की  ये कुर्सी,क्या-क्या करतब करवाती है
लोकतन्त्र  के  मुर्दघाट में ,गरूढ.पुराण  ही क्यों गाती है
कवि  आग  का  अंगारा  भी ,इसी राख  से  ढक जाता है
जिसका जूता उसी के सिर पे,मेरे बाप का क्या जाता हेै।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                  मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

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