Saturday, January 24, 2015

                 हकीकत
सियासत  ने   हमारी   कौम   को   मुर्दा  बना डाला
सिर खोकर जवानो का किया क्योंअपना मूॅंह काला
ये  मुर्दे  हैं  मेरे  घर  के   जिन्हे   हमने  सदा  पाला
मेरे  घर  को  मेरे  घर   के   दरिन्दो  ने, ही खंगाला

यहाॅ  तो,  मौेत   के   मंजर   को  मुर्दे   रोज  ढोते हैं
सियासत  के  शवों  से  क्यो  सदा  इतिहास खोते हैं
हमें   गीता   बताती    है , कि   कैसे   पेश  आना है
अब   तो  लाश   को   ढोना   तिरंगे   का  फसाना है

क्यों पाकिस्तान का खण्डहर मेरी बुनियाद  ढोती है,
क्यों   कब्रिस्तान  के   मुर्दों   से , ये  जेहाद  होती हेै
कंही  तो  हल  छिपा  होगा  इन्हें  जड़  से हटाने का
अजब   कैसा  तरीका  है ,सियासत   को  बचाने का

मुर्शरफ  की   खुशामद  से   यंहा  पर  रेल चलती है
हमारी   कूटनीति   से    हूकूमत   इनकी   पलती है
कंही  कोइ  समय  सीमा  भी, है  इनसे निपटने की
गीता  और  कुरानो   में   कंहा   हैे   बात  कटने की

यहां  तो  एक  ही  रोना  है  बस, बातें  ही  चलती हेैं
हूकूमत  जब  बदलती  है, तो  येहरकत मचलती है
हमं  भी  गीत लिखतें  हैं,मिटा दो उनकी हस्ती को
कलम  कर  दो  हूकूमत  से इस फिरका परस्ती को

नंगो  और   मतंगो   के   ये   पंगे  हम  ही  सहते हैं
ये  घुस -  पैंठ   करके  भी  मेरे  घर  में  ही  रहते हैं
गरीबी  और  मंहगायी,का   ये   भी   एक  कारण है,
पाकिस्तान  का   आतंक,  दुनिया   में  उदाहरण है

कंही  अगंला, कंही  कंगला, कंही   बंगला  डराता है
हमारे    देश   का    नेता    हमें    गीता   सुनाता है
कचहरी  में  पढी  गीता, अमल  में   कौन  लाता है
वही   है   कृष्ण   जो   मेरा,  सरहद   में  समाता है

सुनो  दिल्ली, सुनो  मुम्बई ये हम से रोज कहता है
यहाॅं  तो  न्याय  के  मंन्दिर  में भी आतंक रहता है
यहाॅ  हर  शख्स  विस्फोटों  के साये  में ही जीता है
ये  आलम  है सभी घर का निकलना भी फजीता हेै

यहाॅं  आदर्श   गाॅधी  के  क्यों  गाॅंधी- वाद  गाता है
बापू   की   हकीकत   को  तो मेरा   नेता  बताता है
यहाॅ   उपवास   होता   है   तो   भष्टाचार   चलते है
खादी  के  लिबासों  में  ही  नक्सल - वाद  पलते है

पाकिस्तान  का  दरिया  मेरे  घर  में  क्यों बहता है
फितरत  है  मेरे  घर  की, जो हरकत रोज सहता है
अगर  हम  भी  करे  पंगा, तू  नक्शे  में न रह पाये
सरहद  पर  अगर  मूतें  तो  पाकिस्तान  बह  जाये

अमरीका  की  कठपुतली  बन  के कब तक नाचोगे
महाभारत  की  औलादों  गाॅधीको कब तक बाॅंचोगे
अहिंसा  छोड़ कर, ताण्डव  करो  कैलाश बन जाओ
गाॅंधी   का    करो   आदर  ,पर   सूभाष  को  गाओ

इन सपोलों  के  कपोलों  में  कितना   दूध   डालोगे
इन  आतंक  की  नश्लों  को   कितना   और  पालोगे
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब  जहाॅ  आतंक  दिखता है
नेता  को  कुचल  डालो जो इनका भाग्य लिखता है

हूकूमत   का   भरोशा   छोड़   कर   तैयार  होना है
तिरगे  को, सियासत  की फिजां से अब ना ढोना है
उठाओ  अस्त्र  अपने  अब, बस, घुसते  चले  जाओ
वतन का एक ही फतवा हेै,बस,तुम आग बनजाओ

मुटठी  भर  दरिन्दों  का   क्यो   इतिहास  गाते हो
महाभारत  को  पढकर  भी  इतना   खोंप  खाते हो
यहाॅं   संहार   करने    को   खुद   अवतार  आता है
ये हिंसा  भी  अहिंसा   है,  ये   मुरलीधर  बताता है।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
                मो0 9897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment