अखण्ड भारत
यंहा रावण , यंहा लका , यंहा हनुमान का डंका
यंहा राहू , यंहा केतू , यंहा , सीता , यंहा सेतू
यंहा धरती, यंहा अबर, यंहा विष्णु का पीताम्बर
यंहा रघुवंश के राजे , यंहा ब्रह्माण्ड के बाजे
यंहा है भाव की दुनिया, यंहा है चाव की दुनिया
यंहा सत्पथ के वो मानव, यंहा है योगभ्रष्ट दानव
यंहा चंदा , यंहा तारे , यंहा है सप्त -ऋषि प्यारे
यंहा भानू की तप गर्मी यंहा सत्युग के सत्कर्मी
यंहा योगी , यंहा साधू, यंहा औघड़ , यंहा जादू
यंहा वेदो की वाणी है यंहा सत् पथ के प्राणी है
यंहा द्वापर, यंहा त्रेता, यहा है वेद के वेत्ता
यंहा वेदान्त गीता है , सनातन धर्म जीता है
यंहा मथुरा , यंहा काशी, यंहा ब्रहमाण्ड, के वाशी
यंहा सागर यंहा दरिया, यंहा हैं इन्द्र की परियाँ
यंहा जोगी , यंहा जगल, यंहा सिंहल, यंहा पिंघल
यंहा श्रवणका स्रोता जल, यंहा सम्राट सतपथ नल
यंहा पूजा , यंहा भक्ति , यंहा सृष्टि अनासक्ति
यंहा है ब्रह्म की माया, यहा है कल्प, की छाया
यंहा है राम की लीला ,यंहा शबरी, यंहा शिला
यंहा अकाश की वाणी यंहा उस धुन के है प्राणी
यंहा है सप्त ऋषियों की तपस्या की धरा क्या है
यंहा है सप्त श्रोतो का जल, जंगल जरा क्या है
यंहा है सात चक्रों का अन्तर मे‘त्वरा’ क्या है
यंहा है सात अरूणो के भेदों में भरा क्या है
हमे ब्रहमाण्ड की भूमि घर जैसी ही भाती थी
सनातन धर्म की गाथा चराचर सृष्टि गाती थी
हमारा वेद सेतु है, मुक्ति पथ बनाने का
यंहा गीता बताती है पथिक पथ आने जाने का
हमारे योग में चिन्तन, हमारे भोग में चिन्तन
हमारे रोग मे चिन्तन, हर सहयोग मे चिन्तन
यंहा हर युग में चिन्तन है,यंहा रग-रग,में चिन्तन है
जन्म चिन्तन का कारण है,यंहा चिन्तन,उदाहरण है
हम हैं जीव, उस युग के प्रमाणों में नही जीते
हमारे शिव की सरिता का गंगाजल सभी पीते
ये है कुम्भ की नगरी जंहा अमृत बरसता है
यंहा अवतार लेने को ब्रह्मा भी तरसता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
यंहा रावण , यंहा लका , यंहा हनुमान का डंका
यंहा राहू , यंहा केतू , यंहा , सीता , यंहा सेतू
यंहा धरती, यंहा अबर, यंहा विष्णु का पीताम्बर
यंहा रघुवंश के राजे , यंहा ब्रह्माण्ड के बाजे
यंहा है भाव की दुनिया, यंहा है चाव की दुनिया
यंहा सत्पथ के वो मानव, यंहा है योगभ्रष्ट दानव
यंहा चंदा , यंहा तारे , यंहा है सप्त -ऋषि प्यारे
यंहा भानू की तप गर्मी यंहा सत्युग के सत्कर्मी
यंहा योगी , यंहा साधू, यंहा औघड़ , यंहा जादू
यंहा वेदो की वाणी है यंहा सत् पथ के प्राणी है
यंहा द्वापर, यंहा त्रेता, यहा है वेद के वेत्ता
यंहा वेदान्त गीता है , सनातन धर्म जीता है
यंहा मथुरा , यंहा काशी, यंहा ब्रहमाण्ड, के वाशी
यंहा सागर यंहा दरिया, यंहा हैं इन्द्र की परियाँ
यंहा जोगी , यंहा जगल, यंहा सिंहल, यंहा पिंघल
यंहा श्रवणका स्रोता जल, यंहा सम्राट सतपथ नल
यंहा पूजा , यंहा भक्ति , यंहा सृष्टि अनासक्ति
यंहा है ब्रह्म की माया, यहा है कल्प, की छाया
यंहा है राम की लीला ,यंहा शबरी, यंहा शिला
यंहा अकाश की वाणी यंहा उस धुन के है प्राणी
यंहा है सप्त ऋषियों की तपस्या की धरा क्या है
यंहा है सप्त श्रोतो का जल, जंगल जरा क्या है
यंहा है सात चक्रों का अन्तर मे‘त्वरा’ क्या है
यंहा है सात अरूणो के भेदों में भरा क्या है
हमे ब्रहमाण्ड की भूमि घर जैसी ही भाती थी
सनातन धर्म की गाथा चराचर सृष्टि गाती थी
हमारा वेद सेतु है, मुक्ति पथ बनाने का
यंहा गीता बताती है पथिक पथ आने जाने का
हमारे योग में चिन्तन, हमारे भोग में चिन्तन
हमारे रोग मे चिन्तन, हर सहयोग मे चिन्तन
यंहा हर युग में चिन्तन है,यंहा रग-रग,में चिन्तन है
जन्म चिन्तन का कारण है,यंहा चिन्तन,उदाहरण है
हम हैं जीव, उस युग के प्रमाणों में नही जीते
हमारे शिव की सरिता का गंगाजल सभी पीते
ये है कुम्भ की नगरी जंहा अमृत बरसता है
यंहा अवतार लेने को ब्रह्मा भी तरसता है।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
मो0 9897399815
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