Sunday, January 4, 2015

 (एक हास्य,व्यंग की रचना लम्बी है,क्षमा चाहता हूं।)                      

                               वेदना
मैं मरा मुहब्बत मै भूखा ,तू मस्त मचलती चली गयी
मैं करता गया भरोशा तू  मूझको ही छलती चली गयी
मै सडक छाप मजनूॅं बनकर  तेरे  पग चिह्न निहार रहा
तू   पार  हुयी बैतरणी से  मैं  खडा - खडा उस पार रहा
तू हवा में उडती  चिडिया है मैं गिद्व हूॅं चील परिन्दों सा
तू  काम  वाशना  शदियों से  मैं  हूॅं  दरवेष दरिन्दों सा
मैं बुझा हुआ चिरागों  सा  तू लौ  सी जलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू  मुझको ही छलती चली गयी

मैं  वीर, व्यंग  की  कविता  हॅूं ,तू  शोला  है सृगांरों की
मैं  बुझी आग हॅूं चुल्हे  की, तू  लपट  आग  अंगारों की
मैं पेड हूॅं  नीम  हकीमों का  तू  बेल  गिलोयी  की उपर
मैं पैसेन्जर  का  डिब्बा  हॅूं  तू , एयर  कण्डीशन  सूपर
मैं तार बाड हॅूं काॅंटों की तू गुल और  चमन बहारों  की
मैं कारतूस  हॅूं  बुझा हुआ तू  खोज नयी  हथियारों की
तू अपने नयन कटारों से ये आग उगलती  चली  गयी
मैं करता गया भरोशा तू मुझको ही छलती चली गयी

मैं राम  देव  हॅूं  योगा  का  तू राखी   खुले स्वयंबर की
मैं जून  जुलाई  की  गर्मी  तू  ठंड है  भरे दिसम्बर की
मैं पतझड  का मौसम हॅूं तू बसन्त ऋतु  की हरियाली
मैं  पूरातत्व  का  बरगद  हूॅं तू  बौर लदी अमुवा डाली
मैं बेर हूॅं  झाड - झंकारों का  तू  लीची लाल बहारों की
मैं टम- टम बुग्गी का घोडा  तू  डोली  लदी कहारों की
मैं इन्तजार में खडा रहा  तू  मुझे मसलती चली गयी
मैं करता गया भरोशा तू मुझको ही छलती चली गयी

मैं  बिहार   का  लालू   हॅूं   तू   माया   है  तू  ममता है
मैं प्यासा  अटल  बिहारी हॅूं  तू राजनीति की क्षमता हैे
मैं  मनमोहन   मौनी   बाबा तू  काॅंग्रेस   की   बोली है
मैं  ब्रह्मचारी  गोविन्दा  हूॅ  तू  उमा   बडी    ठिठोली है
मैं कम्युनिष्ट तू सोसलिस्ट तू  झण्डी लाल दिखाती है
मैं मोटा  चावल सेले  का  तू   बासमती   बलखाती है
मैं जिस मोड पे मिला तूझे तू  राह बदलती चली गयी
मैं करता गया भरोशा तू मुझको ही छलती चली गयी

तू  दिल्ली  का राष्ट्र  खेल , मै  अदना  एक खिलाडी हूं
तू  है अब  तक  बची  हुयी, मैं फंसा  हुआ कलमाडी हॅूं
तू राजनीति  में  खादी है,बर्बाद  हुयी  अब  छक्कों से
मैं नया नमाजी मुल्ला हूं जो घिरा हूं  चोर उचक्कों से
तू कामकला की माहिर है मैं रामलला  जग जाहिर हॅूं
तू आशा मंदिर,मस्जिद की मैं तोड-फोड  में माहिर हॅूं
तू धर्मकर्म के झगडे में भी फूलती  फलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती चली गयी

मैं  राष्ट्र -भक्त हॅूं  भारत  का  तू  पाकिस्तानी फतवा है
तू  घुटी  हुयी   आतंकी   है  दुनिया  में  तेरा  रूतबा हैं
तू  मेरे घर की खुशीयों को भी  कभी देख नही पाती है
बे-गुनाह भीड  में  घुसकर के तू ही विस्फोट कराती है
घर  में  खाने  के  लाले  हैं  पर पंगा करना फितरत है
बस, तेरे  इन  कूकर्मो से दुनिया  में  तू  ही  नफरत है
बिना बात र्निदोषों  का सुख चैन निगलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती चली गयी

मैं ओबामा  तू   ओसामा , दुनिया  में  कहर  ढहाती है
मैं प्रेम  प्रसारण  करता हूॅं  तू हरदम  जहर  फैलाती है
मैं विश्वामित्र  तपस्वी  हूॅं  तू  मेनका  बन के  आयी है
मै रोडा पथ पर पडा  हुआ तू  शिखर की उॅंची खायी है
मैं कभी ताज  था दुनिया  अब  तू  ही  राज चलाती है
तू नई कौम की रग रग में, महामारी सी घुस जाती है
मैंं रोता रहा स्वयंबर को तू मस्त मचलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मुझको ही छलती चली गयी

मै  लहर  हॅूं  बहती  गंगा  की तू  सागर  की सूनामी है
मै बाबा नंग  लंगोटा  हॅूं  तू  लोभ ,मोह,मद , कामी है
मै योगी  बनना  चाहता  हॅूं  तू नये  रोग  ले  आती  है
मै  धरा  में  नंगा सोता  हूॅं, तू  भ्रष्ट  मुझे  कर जाती है
मै जितना तुझसे बचता हॅूं,तू चिन्तन बनकर आती है
मैं  दुनिया छोड के  जीता  हूॅं ,तू काम नये करवाती है
मैं हिम के  उपर बैठ गया तू काम उबलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मुझको ही छलती चली गयी

तू  जल - तरंग  सारंगी  है,  मै  ढोल, दमाउॅं  दासों का
तू  मन्द - मन्द  मुस्काती है, मैं  तृष्कार उपहासों का
तू  वेणू  है सुर संगम  की  मैं  फटा  बाॅंस सा गायक हूॅं
तू काम  चलाती  दुनिया  का,मैं कामचोर नालायक हॅूं
तू थिरकन  हेै हर गीतों  की,मैं काॅंप रहा थरथर कामी
तू  उॅंची  कीमत  की   बोली , मैं  चौराहे  की  नीलामी
मैं गिरा सूरों से तालों से  तू गिरी संभलती  चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती  चली गयी

मैं ग्राम सभा  की कटी लीज तू फारम  हाउस नेता का
मैं लोकसभा और राज्य सभा तू र्रगमॅंच अभिनेता का
तू   रेखा ,  हेमा ,  श्री  देवी , मैं  प्रेम   चैपडा  आवारा
तू  सत्ता  और   सियासत  है  मैं  तेरी कूर्सि का प्यारा
तू संविधान  है  भारत  का  मैं  संविधान  का  मारा हूॅं
तू ढीली  और  लचीली  है , मैं  हरदम  तुझ से हारा हॅूं
मै सजा सुनाता हॅूं जिनको तू उनसे पलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती चली गयी

मै भारत हॅूं ,महाभारत हॅूं , तू  हिन्दुस्तान  भिखारी है
मैं भरा  हुआ भिखमंगों  सेे तू  आज  देश  में  भारी है
मैं  जनमत  बनवाता  हॅूं ,तू  लूट  खसोट के  खाती है
तू  वतन लूटने  वालों की सिरमोर बनी क्यों  जाती है
मैं धोती  कुर्ता  पाजामा  इस  लोक तंत्र का  जोकर हॅूं
तेरे कीचढ से भॅंडा  हुआ बस  लालकिले का  पोखर हॅूं
मैं गौरव राष्ट्र तिरंगा हॅूं तू कफन  बदलती चली  गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती चली गयी

तू स्विस बैंक  का  खाता  है मैं  नौ के दस करवाता हॅूं
तू  काले  धन  की  माहिर है मैं  खुर्चन  तेरी  खाता हॅूं
बाबा  हैे  पीछे  पडा  हुआ भारत में  तूझे  बुलवाने को
तेरी  ही  महिमा गाता  है  वो, राजनीति  मे  आने को
ये  अरबों  का  घोटाला  कुछ  रोक  रहै  कुछ भोंक रहे
तू  मुद्दा  बनकर  आई है  सब अपनी ताकत झोंक रहे
तू अजगर  है श्वांसो  से, ये  राष्ट्र  निगलती चली गयी
मैं करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती चली गयी

क्यों भटका था जन्मों से में ये बात समझ में आयी है
स्वर्ग ,र्नक ,चौरासी  के  गो- रस  में  छिपी   मलाई है
कहीं मोक्ष द्वार खुलवाती कहीं सीधा नरक दिखाती है
कहीं वशुन्धरा  है  हीरों की कहीं कब्रिस्तान बनाती है
ये लता है सावन भादों की अवलम्बन  वृक्षों की डाली
तू आलिंगन आधार  शिला तू जंगल मंगल मतवाली
मैं बूढा होकर धरा गिरा तू सती सी जलती चती गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलतीचली गयी

मैं  छोटी  मोटी  तुकबन्दी, तु छॅंटे  छॅंटाये  राष्ट्र कवि
वो कवि श्रेष्ठ हैं भारत के,हम हैं लोकल फरमान छवि
वो  एक  गाीत  ही  गाते  हो ,ये  सारे दर्शक जान गये
वो राष्ट्र कवि जग जाहिर हैं  भेैया ये हम भी मान गये
कविता तो मेरी फितरत है,निःशुल्क मंच पर गाता हूॅं
मैं अपनी  प्रतिभा की  नौका,सूखे  मैं  नहीं चलाता हॅूं
तूमने जो मुझको दी पीडा,घावों  में गलती चली गयी
मै करता गया भरोशा तू मूझको ही छलती  चली गयी!!
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ( आग )
                      मो0 9897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

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