लालकिला
मैं लालकिला हूं सातदशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
मुगल और अंग्रेजो की भी मैे ही पुस्तेनी काया हूं
प्राचीर से राजनीति के चीर हरण को मैं ढोता हूं
संविधान की काम-वाशना, बलात्कार से मैं रोता हू
स्वतन्त्र,गणतन्त्र दिवश के अधिनायक से शर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
नेहरू,लालबहादुर,इन्दिरा का परचम भी लहराया था
जाने कितने लावारिस ने मुझ पर झण्डा फहराया था
मुझ पर चढ कर भाषण देना नेता की गौरव गाथा हेै
रातनीति में हर नेता को मुझपर चढना क्यों भाता है
कहने को तो स्वाभिमान हूंं, नेता से लुटता आया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
मेरे उपर चढकर नेता भारत को भरमाते आये
देश से किसको क्या लेना है,सबने अपने गाने गाये
धर्म,मजहब और सम्प्रदाय की नेताजी बातें करते है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई झगडो में सब मरते है
व्यभिचारी और भ्रष्टाचारी, हर नेता की मैं छाया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
छोटे - छोटे राजनीति के डबरे मुझको देख रहे हैं
गठबन्धन की आशाओं से, अपनी नजरें सेंक रहे हैं
कौम,कबीले, जाति-पांति के गठजोडो से भरमाते है
देखो कालनिमी भारत के राष्ट्र-गीत कैसे गाते हेैं
जिस पर किया भरोसा मैंने,उससे ही मैं पछताया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
अब मोदी पर किया भरोशा, स्वाभिमान को पाने का
कुछ वंहा भी मौका ढूंढ रहे हैं,राजनीति गर्माने का
वो अटल बिहरी ,सिंह नाद से संसद में गुर्राते थे
कंहा गये वो देश के नेता, राष्ट्र - भक्ति जो गाते थे
मैं आलीशान भवन दुनिया का था,अब जर्जर काया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
संविधान की कसमे,रस्मे खाकर मुझपर चढने वालों
भारत मां को लूट-लूट कर, खाने वालों सभी दलालों
आशा,भांषा,भाव,भंगिमा से मुझको क्यों तोड रहे हो
राजनीति से टुकडे-टुकडे करके भारत जोड रहे हो
आजादी के बाद आग के छन्दो से मैं गर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com
मैं लालकिला हूं सातदशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
मुगल और अंग्रेजो की भी मैे ही पुस्तेनी काया हूं
प्राचीर से राजनीति के चीर हरण को मैं ढोता हूं
संविधान की काम-वाशना, बलात्कार से मैं रोता हू
स्वतन्त्र,गणतन्त्र दिवश के अधिनायक से शर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
नेहरू,लालबहादुर,इन्दिरा का परचम भी लहराया था
जाने कितने लावारिस ने मुझ पर झण्डा फहराया था
मुझ पर चढ कर भाषण देना नेता की गौरव गाथा हेै
रातनीति में हर नेता को मुझपर चढना क्यों भाता है
कहने को तो स्वाभिमान हूंं, नेता से लुटता आया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
मेरे उपर चढकर नेता भारत को भरमाते आये
देश से किसको क्या लेना है,सबने अपने गाने गाये
धर्म,मजहब और सम्प्रदाय की नेताजी बातें करते है
हिन्दू,मुस्लिम,सिक्ख,इसाई झगडो में सब मरते है
व्यभिचारी और भ्रष्टाचारी, हर नेता की मैं छाया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
छोटे - छोटे राजनीति के डबरे मुझको देख रहे हैं
गठबन्धन की आशाओं से, अपनी नजरें सेंक रहे हैं
कौम,कबीले, जाति-पांति के गठजोडो से भरमाते है
देखो कालनिमी भारत के राष्ट्र-गीत कैसे गाते हेैं
जिस पर किया भरोसा मैंने,उससे ही मैं पछताया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
अब मोदी पर किया भरोशा, स्वाभिमान को पाने का
कुछ वंहा भी मौका ढूंढ रहे हैं,राजनीति गर्माने का
वो अटल बिहरी ,सिंह नाद से संसद में गुर्राते थे
कंहा गये वो देश के नेता, राष्ट्र - भक्ति जो गाते थे
मैं आलीशान भवन दुनिया का था,अब जर्जर काया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं
संविधान की कसमे,रस्मे खाकर मुझपर चढने वालों
भारत मां को लूट-लूट कर, खाने वालों सभी दलालों
आशा,भांषा,भाव,भंगिमा से मुझको क्यों तोड रहे हो
राजनीति से टुकडे-टुकडे करके भारत जोड रहे हो
आजादी के बाद आग के छन्दो से मैं गर्माया हूं
मैं लालकिला हूं सात दशक से झण्डे ही ढोता आया हूं।।
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा(आग)
9897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:
Post a Comment