Monday, January 19, 2015

                      बाबा का ढाबा
पहले दो,फिर चार  हुये, अब  दश  को  भी तैयार हुये
उस मशीन  से  भी पूछो, जिस  पर ये अत्याचार हुये
अब एक  पालना  भारी  है, उस  पर भी मारा मारी है
ये बाबा, माई, साधू  हैं, या  गेरू  में  छिपे  शिकारी है

हम सभी गृहस्थी बैल हुये ये सांड  सडक के शैल हुये
हम घास,फूस हैं, छप्पर हैं, ये  बाबा अब खपरैल हुये
हम मजदूरी  करके  खाते  हैं ,बच्चे भी हमी बनाते हेैं
ये खुले  सांड क्यों घूम  रहे,जो  जगह-जगह गुर्राते हैं

इस डेढ. अरब  की  भीडो  में , अण्डे सडते है नीडो में
जो बच्चे  पैदा  होते हैं, मरते  हैं,  लावारिस  कीडो में
बेरोजगार  हैं  सडको  पर, नजरें हैं लडकी,लडको पर
दाल हवा  में गलती  है,तुम  छोंक  रहे हो तडको पर

ये कालेधन  के रखवाले,  भगवान ये  के बर्छी-भाले
ये कालनिमी,ये  दरवेषी, हम  सभी गृहस्थों ने पाले
ना जाने अपनी लावारिस,ये कितनीे  फौज बनाते हैं
बेफिक्र,आवारा सांड यंहा,मस्ती और मौज मनाते हैं

शंकराचार्य बने चार थे, क्यों  अब  चार सौ साठ बने
इन सबके चांदी  के आसन है, देखो ये कैसे ठाठ घने
छप्पनभोगों की भिक्षा है क्या यही सनातन शिक्षा है
मठ,मन्दिर आलिशानों में  भी पंच-विकारी इच्छा है

अल्लाह  के  बन्दे  भी अन्धे, इसी काम में माहिर है
बच्चे ही पैदा करने में, ये सर्व-विदित जग  जाहिर है
ना रोटी  है,  ना  कपडा  है, रहने  को नही ठिकाना है
ये ग्वाल - बाल की  धरती  है,धर्मो का ताना-बाना है

तीस  करोड  थे,दश हजार मुगलों ने हम को लूटा था
फिर हम चालीस करोड हुये,अंग्रेज ने हमको कूटा था
अब  डेढ अरब  गुलाम हैं हम, आजाद देश में रहते है
रहने  को  घर - बार  नही, बस  भारत माता कहते है

अपने  ही  हमको  लूट  रहे, ये  राजनीति बतलाती है
गुमनाम गरीबो की बस्ती बस,चोरों की ही ख्याती है
ना गृहस्थी का ठौरठिकाना है,विरक्त हैआलीशानो में
अपनी भी गिनती होती है,बस लावारिस मेहमानो में

बाबा ये बच्चे बन्द करो,कुछ प्रेम प्यार की बात करो
इन डेढ अरब की भीडो में,ना जनसंख्या आघात करो
राम ,कृष्ण,महावीर, बुद्व,बस, एक ही सूरज पनपाओ
कवि आग की विनती है, बस धर्म  सनातन ही गाओ।।
              राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                  मो09897399815
     rajendrakikalam.blogspot.com

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