Saturday, January 17, 2015

                 पोखर में नौकर और जोकर
राष्ट्र ध्वजा को आई.ए.एस.,आई.पी.एस.भी फहरायेंगे
मालिक बनकर अब नौकर,हमको औकात  दिखायेंगे
मेजर,जनरल,कर्नल,बर्नल,अब आग यंहा सुलगायेंगे
इस  प्रजातन्त्र  में  चपरासी,  अधिकारी, बाबू,आयेंगे

ये  संविधान  तो  नंगे, भूखे,सबके रस्ते  खोल रहा है
चोर, उचक्के, डाकू  सबको ,अपना काकू बोल  रहा है
उद्योगपतिऔर बाबाओं को सस्ता रस्ता दिखा रहा है
डेढ अरब  को राम नाम  की लूट,छूट से सिखा रहा है

आओ भैया,तुम भी आओ,इस गंगा में पाप को धोलो
बस,थोडा सा कष्ट  यही है, सधे,गधे को बाप ही बोलो
अनपढ, भौंदू के चरणो में,स्वाभिमान का माथा टेको
चौराहों के हर  जमघट  पर,मुंह  में जो भी आये फेंको

किरण, केजरी   जैसे  जाने, कितने नौकर घूम  रहे हैं
सरहद  के  फौजों  के  झण्डे,  चौराहों  पर झूम  रहे है
छोड   मिडिया, पत्र - कारिता,   सत्ता, सत्तू चाट रहे है
अब  बैरिष्टर  भी  लालाहित, संविधान को बांट रहे हैं

जज,मुजरिम दोनो हीअन्दर,सारे गांधी जी के बन्दर
जो जितना  लूटेगा भारत,वो ही सबसे बडा सिकन्दर
सारे  अपने- अपने  अनुभव,प्रजातन्त्र  में  छोड रहे हैं
कुछ नौकरसाही से जोडा,अब लोकतन्त्र से जोड रहे है

हम जैसे मुर्दे  भारत  में ,जब तक शव,शमशान रहेंगे
सांड, गधे, घोडे, कुत्ते  भी, तब  तक ये फरमान कहेंगे
आरक्षण, संरक्षण  कीडे, सब प्रजातन्त्र  में लहरायेगे
कौम कबीले,जाति- पांति  के कीट-पंतगे अब आयेगे

हे,जनमत के नायक,मत की कीमत  कब पहचानोगे
तुम  ही  तो भारत की असली ताकत हो कब जानोगे
साठ साल  की  नौकर साही,राजनीति  में  बन्द करो
कवि आग के छन्द पढो, और कुछ  ऐसा प्रबन्ध करो।।
            राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा (आग)
                  मो09897399815
          rajendrakikalam.blogspot.com

No comments:

Post a Comment