वृक्ष की वेदना
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं क्यों श्रृंगार कर?
बलिदान में भी जी रहा हूॅं मैं स्वयम् को मारकर
बेमौत मरने का हूनर और हस्र भी मैं जानता हूॅ
मैं आदमी की हरकतें, संस्कार से पहचानता हूॅ
झकझोरतीे है अस्मिता,मुझको धरा से प्यार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होताहूॅं --
वो जमाना था कभी जब खुद खडा होता था मैं
मौसम,ऋतु के आासियाने में ब डा होता था मैं
नर्सरी की परवरिस ,बे मौत मुझको मारती है
लावारिसी हर राह पर, बस,ठोकरें ललकारती हैं
हो गया अस्तित्व मेरा इस जहाॅं में दर -बदर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -----------
मैं ऋतु के पुष्प ,फल की ,फितरतों में जी रहा हूॅं
तृष्कार में भी विष की वृष्टि सा,लहु को पी रहा हूॅं
आजाद होकर भ्रूण - हत्या के नियम से पार हूॅं
पर्यावरण और प्राणियों का भी परं आधार हूॅं
बस, ये मेरी ही जीत है ,मेैं जी रहा हूॅं हार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं --------
माफियाओं की नजर मेरी जवानी छाॅंटती है
बस,कौडियों के भाव में, बे-दर्द मुझको काटती है
कुर्बान होकर भी तुम्हारी शान,मैं दिखला रहा हॅूं
मैं अहिंसा प्रेम का सबको सबक सिखला रहा हूॅं
नित दे रहा हूॅं श्वांस सब को,मैं पवन संचार कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -------
मठ,मन्दिरों, और आसियानों में हमेशा से जडा हूॅं
जलजीवजीवन और धरा कीआस में हरदम खडा हूॅं
जन्म से मैं मृत्यु तक उपयोग होता जाउंगाॅं
खुद फॅंना होता हुआ भी काम सब के आउंगाॅं
निर्जीव होकर जी रहा हूॅं , जीव को संभाल कर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं -------
मजबूर हूॅं जीवन, मरण, पर्यावरण से बॅंट रहा हूॅं
मैं सदा इस आदमी के हाथ से ही कट रहा हूॅं
मै----- प्रकृति हूॅं , मुझे बस ! छेडना जेहाद है
कोई तो मुझको बतादो क्या ? मेरा अपराध है
मैं सतत् प्रहरी बना हूॅं , काल के हर द्वार पर
बंजर जमीं में अंकुरित होता हूॅं ------
मुझको बचाना आदमी की हो गयी मजबूरियाॅं
बन गयी हैे आवश्यकता की प्राकृतिक दूरियाॅं
मैं मौन था मरता रहा इस आदमी के हाथ से
अब आदमी ही घुट रहा है , कुदरती आघात से
संस्कार से जो कुछ मिला, देता रहा मन मारकर
बंजर जमी में अंकुरित होता हॅूं क्यों श्रृंगार कर
नंगी धरा को देख कर आश्चर्य मुझको हो रहा है
मेरी सुरक्षा से यहाॅं अस्तित्व मेरा खो रहा है
मैं लंगोटी की तरह अब इस जॅंहा को ढक रहा हॅूं
त्रैमास की मौसम, ऋतु से मौन होकर बक रहा हॅूं
हर शख्स लिपटा है कफन में सृश्टि का संहार कर
बंजर जमी में अंकुरित होता हूंं क्यों श्रृंगार कर
रूग्णता बिमारियों ,से जब कभी मैं सूखता हूं
लाश बनकर, लाश मानव की बराबर फूंकता हूं
जातियों, कौमों, कबीलों, मजहबों से दूर हूं
पर्यावरण की दृश्टि में , मैं आज भी नासूर हू
लिख रहा है आग मेरी वेदना, अंगार पर
बंजर जमी में अंकुरित होता हूं क्यों श्रृंगार कर
राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा ;(आग)
मो09897399815
rajendrakikalam.blogspot.com

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