Monday, January 19, 2015

                प्रजातन्त्र के जोकर
क्यों मेरे घर की लकडी से  अपना  चुल्हा  सुलगाते हो
मॅंगायी  हम  झेल  रहे, पकवान  तुम्ही  क्यों खाते हो
हे,बे-शर्मो नमक,तेल और लकडी का कुछ  ध्यान करो
इस चोर,डकैती कीमाया से हम पर कुछ एहसान करो
क्यों  भ्रष्टाचारी   पतनाले  शदियों  से तुम्ही  बहाते हो
क्यो मेरे  घर  की  लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

इस  राजनीति  में  नंगा  और लफंगा तुमको देखा था
तुम थे  नजरों  से  गिरे हुये थोडा भी नही सलीखा था
अब चरित्रवान का ठप्पा है खादी के कफन लिबासों में
जनता भी  तुझको  मान  गयी ,जीती  है तेरे झाॅंसों में
हमसे ही जनमत पा करके हमको ही आॅंख दिखाते हो
क्यों मेरे  घर  की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

डेढ़ अरब  की  आबादी कुछ जोकर मिलकर हाॅंक रहे
धर्म,मजहब की खिडकी से भारत की इज्जत झाॅंक रहे
तुम  राजनीति  की नजरों से माॅं को भी नंगा पाते हो
व्यभिचार के खलनायक तुम राष्ट्र-गीत क्यों गाते हो
भारत की खुशहाली में तुम, मिलकर आग लगाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

संसद की दोनो दीवारें अबऔकात तुम्हारी जान गयी
तुम कितने बडे़ कमीने  हो,ये सारी जनता मान गयी
इस राजनीति के नाटक में तू, सबसे बडा खिलाडी है
तू कैसा मालिक है घर  का  ना  खेती  है  ना बाडी है
जनता से जनमत पाकरके अब जनता को ही खाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

इस राजनीति के चक्कर में ये राष्ट्र फंसा कहराता है
तू कूरूक्षेत्र का महाभारत, शकुनि  का छोटा भ्राता है
तू नक्शल  वादी,  आतंकी  बैठा  है  घात लगाने को
तैयार खडा है नर-भक्षी क्यों डेढ-अरब को खाने को
वैेमनस्य की अग्नि  से  जनता  की चिता जलाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

दलब दलू,नौटंकी नायक,पहचान भीअपनी भूल गया
अपना ही बाप बदल डाला,दुसरे  की गोदी झूल गया
नारी भी तेरे साथ चली, जो खसम को धोखा देती हैं
ये राजनीति है नगर - वधु, या ये  लावारिस खेती है
अपनी पत्नी को छोड-छाड ,इनसे ही दिल बहलाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो

अखण्ड -राष्ट्र के सपने  को, ये  तूने  कैसे  चूर किया
क्यों भारत को खण्डो  में  जनमत से  मजबूर किया
क्या मर्जी  है  दर्जी  तेरी ,तू , कितने  टुकडे़ काटेगा
इस राम,कृष्ण की धरती का,बैनामा कितना बाॅंटेगा
मैं कविआग हॅूं पर तुम तो मुझपर भीआग लगाते हो
क्यों मेरे घर की लकडी से अपना चुल्हा सुलगाते हो!!
             राजेन्द्र प्रसाद बहुगुणा;आग
                 मो09897399815
       rajendrakikalam.blogspot.com

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